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सफलता प्राप्त करने के बाद का संघर्ष

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  आज आपको मेरे ब्लॉग के इस शीर्षक को पढ़ने के बाद कुछ अजीब सा लग रहा होगा। पक्की बात है कि आप सोच रहे होंगे कि भला सफलता प्राप्त करने के बाद कौन सा संघर्ष करना पड़ता है? सफलता प्राप्त करने के बाद तो बस ऐश मौज मस्ती और आराम होता है।  लेकिन अधिकांश लोगों के साथ ऐसा नही होता है। खासकर उनके साथ तो बिल्कुल भी नहीं, जो अपनी सफलता को बरकरार रखना चाहते हैं। ये बात हम सभी जानते हैं कि सफलता समय के साथ घटती- बढ़ती रहने वाली चीज है। फिर भी जो लोग चाहते हैं कि उनका नाम , उनकी पहचान अथवा उनकी कामयाबी समय के अनुरूप बनी रहे, तो इसके लिए उनको कठिन संघर्ष करना पड़ता है। क्योंकि वो सिर्फ़ आसपास के लोगों की नजर में ही नहीं बल्कि दूर दराज के लोगों के बीच भी अपनी खास जगह बना लेते हैं। अब उनके इन्हीं शुभचिंतकों के बीच कुछ ईर्ष्यालु शत्रु भी दोस्त, परिचित या फिर रिश्तेदार के रूप छुपे होते हैं, जो इस बात की ताक में लगे रहते हैं कि कब उनसे कोई भूल हो और वो उनकी खिंचाई करें। ऐसे लोग आपके जीवन में आपको नीचा दिखाने का कोई भी मौका नही चुकते हैं।  दूसरी तरफ देखा जाए तो अगर आप व्यवसायीं हैं , तो आपसे आ...

रंग भी हमारे व्यक्तित्व व मूड को प्रभावित करते हैं

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बहुत अच्छा से ना सही,  लेकिन कुछ हद तो आपको भी पता होगा कि रंग भी हमारे व्यक्तित्व व मूड को प्रभावित करते हैं.कुछ ख़ास प्रोफेशन में तो खास रंग के ही कपड़े (ड्रेस कोड) पहनने होते हैं. उदाहरण के तौर पर डॉक्टर सफेद कोट अथवा एप्रोन पहनते हैं तो वकील काला कोट ही पहनते हैं. पुलिस खाकी रंग पहनते हैं. कई विशेषज्ञों ने अपने शोध के आधार पर यह प्रमाणित कर दिया है कि अलग-अलग रंगों का प्रभाव मानव के दिमाग पर अलग-अलग पड़ता है. जैसा प्रभाव इन रंगों का हमारे दिमाग पर पड़ता है ,वैसा ही प्रभाव हमारे मूड पर पड़ता है.यानि की रंग भी हमारे मूड को प्रभावित करते हैं। हमारे दिल और दिमाग में उठने वाले सकारात्मक और नकारात्मक भाव के लिए काफी हद तक ये रंग भी जिम्मेदार होते हैं. मन के चलिए की हमारे व्यक्तित्व पर इन रंगों का गहरा प्रभाव रहता है. आइये इन रंगों के बारे में विस्तार से जाने कि कौन -सा रंग हमारे व्यक्तित्व और मूड  को किस प्रकार प्रभावित करता है- लाल रंग हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाने और मूड को खुशनुमा बनाये रखने में अहम भूमिका निभाता है. इसे ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के साइकोलॉजिस्ट डॉ. ब्रिवर ने लगभग एक हज...

पढ़ाई करने की कोई उम्र नहीं होती

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हमारे देश में आज भी कई ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें युवावस्था में किसी कारणवश अपनी पढाई बीच में छोड़कर अर्थोपार्जन में लग जाना पड़ा या फिर उनकी शादी हो गयी. अब जबकि वो उम्र के मध्य पड़ाव (३५ -४० में ) पर पहुँच गई हैं और आर्थिक स्थिति भी बेहतर हो चुकी है तो उन्हें युवावस्था में छूटी हुई पढाई को पूरा करने की इच्छा होती है किन्तु संकोच उनका रास्ता रोक देती है. उन्हें मन की बात व्यक्त करने में कभी परिवार वालों से झेंप होती है तो कभी समाज के लोगों से शरम आती है.आज मेरा ये लेख उन्ही महिलाओं के लिए है. दरअसल सच तो यह है कि पढ़ने-लिखने की कोई उम्र सीमा नही होती है. आप किसी भी उम्र में अपनी शिक्षा पूरी कर सकती हैं. इसमें संकोच करने वाली कोई बात ही नहीं है. मेरे पड़ोस में ज्योति जी रहती हैं. इंटर करने के बाद उनकी शादी हो गयी थी. कई बार उन्होंने सोचा कि किसी प्रकार ग्रेजुएशन पूरा कर लूं. पर घर-गृहस्थी संभालने के चक्कर में कभी समय ही नहीं मिला कि पढाई कर पायें. अभी उनकी उम्र 51 वर्ष है. हाल ही में जब उनकी नई नवेली बहु को उनके मन की बात पता चली तो उसने उन्हें पहले तो मोटिवेट किया और फिर पति से बात करके अपन...

फर्स्ट इम्प्रेशन' का महत्व कितना?

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शोभा शादी करके जब ससुराल आई तो उसे पहले दिन ही अपनी सास का वो रूप देखने को मिला, जिसे वो चाहकर भी नहीं भूल पाती है. हुआ यूं कि जिस दिन शोभा ससुराल आई, उस दिन उसकी सास अपनी देवरानी से किसी बात पर बुरी तरह झगड़ पड़ी. बात छोटी-सी ही थी, किंतु शोभा की सास अपने क्रोद्ध  पर क़ाबू न रख सकीं. नतीजा यह हुआ कि पहले दिन से ही शोभा के मन में अपनी सास के लिए कड़वाहट भर गई तथा वह अपनी सास से डरने भी लगी. वैसे उसकी सास का उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार रहता है. फिर भी, ससुराल में क़दम रखते ही पहले दिन वो सास का जो स्वभाव देख चुकी है, उसका गहरा प्रभाव उस पर पड़ा है. यही कारण है किं शोभा आज तक अपनी सास से खुल नहीं पाई है. ऐसे ही एक स्कूल में कल्पना जी को टीचर की नयी-नयी नौकरी मिली. पहले दिन जब वो बच्चों को पढ़ाने कक्षा में गई तो पहले दिन ही बच्चों को इतना डांट-डपट कर पढ़ाया कि बच्चे उनसे डर गए. नतीजा यह है कि बच्चों को अगर कोई सवाल ठीक से समझ में नहीं आता है तो भी वे उनसे यानि कल्पना जी से डर के मारे नहीं पूछते हैं. कक्षा से वे जैसे ही बच्चों को पढ़ाकर निकलती हैं, बच्चे राहत की सांस लेते हैं. देखा जाए...

क्या आपका बच्चा भी लिखने से जी चुराता है ?

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आज मैं इस लेख में बच्चों की पढ़ाई से सम्बंधित एक बड़ी समस्या का जिक्र कर रही हूँ. हो सकता है कि आपमें से कई माता -पिता का ध्यान अपने बच्चे की इस समस्या की ओर नही हो गया हो, किन्तु 24 साल से स्कूली शिक्षा से जुड़े होने के कारण मेरा अपना यह अनुभव रहा है कि आज के बच्चे लिखने से भागते हैं. इसके लिए अगर कोरोना काल में लगे लॉक डाउन को इसका कारण माना जाये तो मैं उससे भी पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ. दरअसल आधुनिक युग के बच्चे मोबाइल, लैपटॉप आदि से इतना ज्यादा जुड़ गये हैं कि उन्हें इन आधुनिक उपकरणों पर टाइप करना आसान लगता है और कॉपी पर लिखना कठिन काम लगता है.जबकि बच्चों के लिए लिखना कितना जरुरी है, ये कोई बताने वाली बात ही नही है. बार -बार किसी पाठ को पढ़ने और लिखने से ही बच्चों में पढाई के प्रति लगन जागती है और वो पढाई में मजबूत बनता है. लिखने की कला अथवा क्रिया से बच्चों को जोड़ने के लिए सबसे ज्यादा ध्यान स्कूल में टीचर को और घर पर माता -पिता को देना चाहिए. अगर आप एक ऐसे माता -पिता अथवा अभिभावक हैं जो ये मानते है कि किसी बड़े स्कूल में दाखिला करवा देने से या घर पर महंगे ट्यूटर रख देने से उनकी जिम्मेदा...

लॉक डाउन के बाद बच्चों की पढ़ाई की स्थिति

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कोरोना महामारी के कारण देश में लगे लम्बे समय के लॉक डाउन लगभग सभी बच्चों की पढाई पर बुरा असर पड़ा है. ऑनलाइन पढाई से बच्चे पढाई से जरुर जुड़े रहे किन्तु इसका कोई ख़ास लाभ उनके शैक्षणिक विकास पर नही पड़ा. ऑनलाइन पढाई के दौरान मोबाइल गेम ने भी बच्चों को अपने गिरफ्त में ले लिया. जिसके कारण माता-पिता की भी कठिनाइयाँ बढ़ी.अब जबकि सभी राज्यों में स्कूल लगभग खुल ही चुका है तो देखा जा रहा है कि बाहर के मौसम को सहन करने के हिसाब से अधिकांश बच्चों की इम्युनिटी पावर पहले की अपेक्षा घट चुकी है और साथ ही एकाग्र होकर याद करने और लिखने की क्षमता भी काफी हद तक पहले की तरह नहीं है. ऐसे में जरुरी है कि अभिभावक और टीचर्स कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखते हुए सभी आयु वर्ग के बच्चों को पुन: स्वास्थ्य  और पढाई के प्रति लगाव पैदा करें.  (1)अभिभावक की आर्थिक स्थिति इस लॉक डाउन में इतनी खराब हो गयी है कि जो महिलाएं पहले घर पर रहकर बच्चों को समय देती थीं, वो भी अब छोटी -मोटी नौकरी अथवा रोजगार से जुड़कर घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में लग गयी हैं, जो कि आवश्यक भी है. फिर भी इस वक्त बहुत ही जरुरी है कि माता -पिता अपन...

कहीं दूसरों के सामने आप भी अपने बच्चे के टेलेंट की नुमाइश तो नही कर रहे हैं ?

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अकसर कई घरों में  बचपन से लेकर आज तक मैं एक अजीब सी बात देखती आ रही हूं। हो सकता है मेरी तरह आपने भी देखा हो और इसे गलत भी समझा हो।  दरअसल ये बात है उन मासूम बच्चों की जिनके अंदर स्वाभाविक रूप से कोई खास बात होती है। मान लीजिए उसे अपनी आयु अथवा क्लास से ज्यादा कोर्स से बाहर की भी चीजें पढ़ने- लिखने आती हो, या फिर उसे गाना, डांस, कोई ख़ास गेम आम बच्चों से अधिक आता हो.  ऐसे में अकसर माता -पिता के मन में आता है कि समाज के चार लोग उसके बच्चे की उस खूबी की तारीफ़ करें. अब ऐसे में घर पर कोई मेहमान, परिचित ,रिश्तेदार अथवा अड़ोसी -पडोसी आ गये तो बात -बात में अपने बच्चे की कुछ तारीफ करेंगे. बच्चे को झट से कुछ ख़ास सुनाने को या पढने को कहेंगे. डांस करने को या गाने को कहेंगे. इतफाक से अगर बच्चे ने माता -पिता के मन के अनुरूप सुना दिया या दिखा दिया तब तो कोई बात नहीं. किन्तु अगर उनके मन के अनुरूप प्रदर्शन नही कर पायें तो खुद को शर्मिंदा होते हुए पाकर सीधा -सा आरोप मासूम बच्चे पर लगा देते हैं. मेहमान के जाने के बाद बच्चे को कसकर डांटना -पीटना अथवा कोसना भी शुरू कर देते हैं. पहले मुझे ऐसा ल...

सादा जीवन उच्च विचार, स्वस्थ तन -मन का है आधार

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एक बात हर बच्चे को बचपन से पाठ्यपुस्तक के माध्यम से या घर के बड़े-बुजुर्गों के द्वारा अवश्य पढाई जाती है – “सादा जीवन उच्च विचार”. किन्तु पता नही क्यों बच्चे जैसे –जैसे उम्र के अलग –अलग पड़ावों से गुजरते हुए जीवन में आगे बढ़ते जाते है, वैसे –वैसे ये उतम विचार ना जाने कहाँ खोते चले जाते हैं और फिर ये विचार किसी भी व्यक्ति को जीवन के उस मोड़ पर याद आता है, जब उसके जीवन में आर्थिक समस्या उत्पन्न होने लगती है. अब यहाँ पर सोचने वाली बात यह है कि अगर जीवन के शुरुआत से ही इस उतम कथन का पालन पूरा परिवार करे तो ख़ास उम्र में इसे अपनाने कि जरुरत ही नही पड़ेगी. क्योंकि जो लोग “सादा जीवन उच्च विचार” को अपने जीवन जीने का आधार बना लेते हैं, वो शुरू से ही अपने घर-परिवार, संस्था, नाते –रिश्तेदार, दोस्त –परिचित सभी को अपने विचार के अनुकूल पाने अथवा बनाने का प्रयास करते हैं. अगर कोई उनके विचार के अनुकूल नही होता है, तो ऐसे लोग चुपचाप उस व्यक्ति से किनारा कर लेते हैं या काम भर रिश्ता रखते हैं. चूँकि आज के डिजीटल युग में कोई व्यक्ति “सादा जीवन उच्च विचार” को अपनाना नही चाहता है. स्टेट्स शो करना एक बीमारी की तरह...

अति का कोई अंत नही होता

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क्या बात है यार ! कितना सुंदर तूने अपना मकान बनाया है. अरे वाह,  मैने जो आज तेरे ऑफिस का इंटीरियर डेकोरेशन  देखा तो सचमुच हैरान रह गया. आज से पहले इतने हाई स्टैण्डर्ड का इंटीरियर डेकोरेशन मैने नही देखा था. बड़ी किस्मत वाली हैं आप जो इतनी सुंदर बहु मिली है आपको. अरे ! आपका बेटा इंजीनियर बन गया , क्या बात है आपके तो अब भाग्य खुल गये , जमकर मांगिएगा दहेज में कैश. अरे भाई ! मैं किसी आम घरेलू पढ़ी -लिखी लड़की से शादी नही करने वाला हूँ. पूरे 7 साल कड़ी मेहनत किया है , तब जाके बैंक में अफसर बना हूँ और अब तो लड़की भी बस मुझे अपनी तरह अछे पद -प्रतिच्स्था वाली ही चाहिए. थोड़ी उम्र ज्यादा हो जाये तो हो जाये , कोई फर्क नही पडता. लेकिन बीबी तो नम्बर -1 चाहिए.  आपने भी अकसर इस तरह की बातें करने वाले को हमेशा ही किसी ना किसी रूप में अपने घर-परिवार दोस्त समाज आदि के बीच जरुर पाया होगा. दरअसल लोग चाहे कितनी भी प्रेरक कथाएँ  पढ़ लें , सुविचार लिख लें, सत्संग में बैठकर भजन -कीर्तन कर लें, यहाँ तक की किसी के निधन होने पर उसके अंतिम संस्कार में शामिल होकर नश्वर जीवन के रहस्य को समझ लें किन्तु क...

किसी की चुप्पी को उसकी कमजोरी मानने की भूल ना करें

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हमारे घर -परिवार से लेकर देश -समाज सभी जगह अधिकाँश लोग चुप रहने वालों को कमजोर समझते हैं या फिर बहुत चालाक समझते हैं. बहुत ही कम लोग आपको ऐसे मिलेंगे, जो चुप रहने वालों को समझदार होने का खिताब देंगे. लेकिन आज इस लेख के माध्यम से मैं आपको अवश्य यह बताने का पूर्ण प्रयास करूंगी कि चुप रहने को जरा सकारात्मक ढंग से देखें और इसपर गहन विचार करें तो इसके कई फायदे आपके व्यक्तित्व को दब्बू नही बल्कि समझदार बनाने में सहयोग करेंगे.  ये तो हम सभी जानते हैं कि मेडिटेशन अथवा ध्यान लगाने से मन शांत होता है और मानसिक तनाव भी घटता है. अगर धर्म और संस्कृति की बात करें तो वहां भी चित को शांत और मौन रहने को विशेष महत्व दिया गया है. इसी शांत रहने के स्वभाव को अकसर सामान्य भाषा में लोग चुप रहना कहते हैं. अगर ऐसे लोग किसी अपमान का सामना चुप रहकर कर लें तो इन्हें दब्बू का नाम दे दिया जाता है या फिर कमजोर मानकर उन्हें आगे भी लोग अपमानित करते हैं, जबकि अधिकाँश बार उनके चुप या मौन रहने के पीछे बड़ी समझदारी छुपी होती हैं. उनको मालूम होता है कि कब, कहाँ, कितना और किसके साथ क्या बोलना है? चुप रहने वाले लोगों के ब...

घर फूटे गंवार लूटे

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‘घर फूटे गंवार लूटे’ शायद ही कोई व्यक्ति हो जो इस कहावत से परिचित ना हो, लेकिन बड़े दुःख की बात है कि इस कहावत को जीवन में अधिकाँश लोग मानते नही हैं. हाल में ही मुझे अपनी एक परिचिता के यहाँ एक वाकया देखने को मिला. चार भाइयों का संयुक्त परिवार था और घर के मुखिया उनके पिताजी थे. चारो भाईयों का परिवार सुखी -सम्पन्न था और घर मिल- जुलकर अच्छा से चल रहा था. अचानक सासू माँ की तबियत ज्यादा ही बिगड़ गयी और उन्हें इलाज के लिए अकस्मात बेंगलोर ले जाना पड़ा. महीने भर के इलाज के बाद वो लगभग ठीक हो गई.  अब इन सबमे जो भी खर्च आया, उसे चारो भाइयों ने आपस में बाँट लिया. लेकिन कुछ ज्यादा आर्थिक भार तीसरे भाई किसलय पर आया , क्योंकि उस वक्त उसके पास बैंक में अतिरिक्त पैसे थे, जिसे वो खर्च कर सकता था.उसकी पत्नी को भी इससे कोई समस्या नही थी. लेकिन बात ही बात में एक दिन पत्नी के मुंह से जरा तीखे अंदाज में यह बात निकल गयी कि अगर हमलोग समय पर पूरा पैसा नही देते तो माँ की जान बचानी मुश्किल हो जाती. किसलय जी ने भी दो बातें पत्नी को आवेश में आकर सुना दिया और देखते -देखते बात इतनी बढ़ गयी कि घर का पूरा माहौल ही बिग...

वर्दी और सम्मान

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आज इस लेख को लिखने के पीछे मेरे साथ हाल ही में घटी एक घटना है. एक छोटे -से सामाजिक समारोह में मुझे सुनने को मिला कि चाहे कितनी भी समाज सेवा या देश सेवा कर लो, लेकिन सरकारी वर्दी में देश सेवा करने का जो आनन्द है, वो साधारण कपड़ों में नही है. कंधे पर लगा हुआ स्टार जब लोग देखते हैं और तारीफ़ करते हैं तो मत पूछ क्या मजा आता है. इसलिए यार मुझे तो हर हाल में प्रशासनिक सेवा में जाना है. आस -पास खड़े लोग उसकी बातों का समर्थन कर रहे थें और मैं एक कोने में खड़ी होकर यह सोचने लगी कि क्या इनकी सोच सही है? और अगर इनकी सोच सही है तो फिर जो लोग इस देश में साधारण कपड़ों में दिन -रात देश -समाज की सेवा में जुटे हुए हैं, क्या उनके कार्यों का कोई मोल नही?  आज की तारीख में अगर आप खुद से सर्वे करने में लग जायेंगे तो आपको बड़ी हैरानी होगी कि हमारे देश में हजारों -लाखों की संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनके पास खुद के जीने के लिए भी पर्याप्त पैसा नही है, मगर समाज हित के कार्यों में जी- जान से जुटे हुए हैं. कोई एक -दो हो तो मैं उनके नाम यहाँ पर लिख दूँ. मेरी नजर में तो ऐसे देश भक्त और समाजसेवी मेरी आँखों के सामने दिन...

बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं

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ये सिर्फ कहने की बात नही है कि बूढ़े और बच्चे एक समान होते हैं, बल्कि ये मानव जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई भी है. बुढ़ापा को मानव जीवन संध्या काल भी कहा  जाता है. यही वो वक्त है जब बुजुर्गों को अपने बसाए हुए परिवार यानि के अपने बच्चों के प्यार व् देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. अपने अनुभव के आधार पर मैं तो कहती हूँ कि इन्हें एक छोटे बच्चे जैसी केयर की जरूरत होती है बुढ़ापे में. लेकिन आज के डिजीटल वर्ल्ड में हमारा समाज आधुनिक नही अतिआधुनिकता की होड़ में अपने ही बच्चे के केयर के लिए समय नही निकाल पा रहा है तो बूढ़े माता -पिता के लिए समय कहाँ से लाएगा? बढती हुई महंगाई ने अधिकाँश घरों में पति -पत्नी दोनों को कमाने में व्यस्त कर दिया है, जिसका सीधा बुरा असर कई घर -परिवार में बच्चों और बूढों दोनों पर ही पड़ा है. फिर भी माता -पिता होने के कारण अपने बच्चों की जिन्दगी के लिए  पति -पत्नी एड़ी -छोटी एक कर देते हैं. लेकिन इन सबके बीच कहीं ना कहीं अपने बुजुर्ग माता -पिता की इच्छाओं अथवा आवश्यकताओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जिसका नकारात्मक प्रभाव बुजुर्ग माता -पिता पर यदि पड़ गया तो बेटे -बहु को भी ...

जो पास है वही ख़ास है

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पूरब अपने कमरे में कान में इयर फोन लगाकर मोबाइल पर व्यस्त था और बगल के कमरे से उसकी छोटी चाची उसे आवाज दे रही थी. दरअसल चाची कमरें में पलंग से टकराकर गिर गयी थीं और सर पे चोट लग गयी थी. वो मदद के लिए पूरब को आवाज देती रहीं और पूरब कान में इयर फोन लगाकर अपने जर्मनी वाले दोस्त से चैट करने में व्यस्त रहा. वो तो भला हो बिट्टू का, जो अपनी छोटी -सी गेंद को पलंग के नीचे खोजने आया तो अपनी मम्मी को गिरा देखकर भागकर पूरब के पास गया और उसे खींचकर दूसरे कमरे में लेकर आया. पूरब ने जल्दी से चाचो को सौरी कहते हुए उठाया और उनकी मलहम -पट्टी किया. बाद में जब बाकि लोग घर के आये तो सारी बात बिट्टू से जानने के बाद पूरब को अच्छी -खासी डांट लगायें.  सच पूछिए तो आज के डिजीटल वर्ल्ड में यह कोई आश्चर्य की बात नही है कि लोग पास के लोगों को नजरंदाज करने लगे हैं और इंटरनेट के माध्यम से मिलने वाले दूर के लोगों को पास समझने लगे हैं. मैं इस बात से हरगिज इंकार नही करती हूँ कि इंटरनेट ने कई बिछुड़े हुए लोगों को मिलाने में अहम भूमिका निभाई है. सोशल मीडिया पर कई अच्छे मित्र व् शुभचिंतक भी लोगों को मिले हैं. कई लोगों क...

अतीत से भविष्य तक के सफर में

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  आज आप मेरे इस लेख के शीर्षक को पढ़कर ये बिलकुल मत समझिएगा कि मैं आपको कोई आध्यात्मिक लेख पढने को कहने वाली हूँ, क्योंकि आज की तारीख में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो आध्यात्मिक विषय पर चिन्तन करना पसंद करते हैं. लेकिन इस सच को भी आप नही नकार सकते हैं कि आध्यात्म हमे जीवन में असली आनंद की ओर ले जाता है.  आज मैं इस लेख में एक ऐसे विषय पर चर्चा कर रही हूँ या फिर कह लीजिये कि अपनी बात रख रही हूँ, जो कहीं ना कहीं आम व्यक्ति के जीवन से गहराई तक  जुड़ा हुआ विषय है. जैसे ही वर्तमान में कोई दुःख आता है, मानव अपने अतीत के उस पल में चला जाता है जिस पल में उसे आज की ही तरह किसी बड़े दुःख का सामना करना पड़ा था. इसके ठीक विपरीत अगर वर्तमान में कोई ख़ुशी प्राप्त होती है तो मानव तुरंत भविष्य के उस पल में चला जाता है जिसे उसने अभी दूर -दूर तक देखा भी नही है. यानि की एक आम मनुष्य कहीं ना कहीं अतीत से भविष्य तक के सफर में यात्रा करता रहता है और बीच में जो वर्तमान पल है उसकी महता को समझ नही पाता है. जबकि उसे अच्छी तरह से पता है कि अतीत कभी लौट कर नही आता है और भविष्य किसी का क्या होगा, ये कोई दावा नही...

छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से भी आत्मविश्वास बढ़ता है

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मनीष ग्यारवीं कक्षा का छात्र है। काफी अच्छा है वह पढ़ने में। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटी-बड़ी प्रतियोगिताओं में भी बराबर हिस्सा लेता रहता है। चाहे वो प्रतियोगिता उसके स्कूल में हो या रेडियो, टीवी, या फिर पत्र-पत्रिकाओं में हो, वह ज्यादातर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है। स्कूल में होने वाले कविता या निबंध प्रतियोगिता में तो वो हमेशा ही हिस्सा लेता है। चित्रकला प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेता है। कई बार प्रथम पुरस्कार मिलता है तो कई बार तृतीय पुरस्कार भी नहीं मिल पाता है। मगर मनीष हौसला नहीं हारता। वो फिर से प्रयास करता है। टी.वी./ रेडियो आदि पर जितने भी इनामी प्रतियोगिता वगैरह होते हैं, उनमें भी वो बखूबी हिस्सा लेता है। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी नाना प्रकार की प्रतियोगिता संबंधी स्तम्भ प्रकाशित होते हैं, उनमें भी वह अवश्य हिस्सा लेता है। मनीष के माता-पिता का कहना है कि, मनीष सिर्फ इनाम पाने के लिए तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेता है, बल्कि अपनी योग्यता व काबिलियत को परखने के लिए भी हर प्रकार की प्रतियोगिता में भाग लेता है। इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से आत्मविश्वास...

रोक लो, रूठ कर उनको जाने न दो

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अक्सर यह देखने में आता है कि छोटी-सी बात पर भाई की भाई से या पति की पत्नी से बहस हो गयी और बढ़ते–बढ़ते बात इतनी बढ़ गयी कि बरसों के रिश्ते पलभर में टूट गए. अभी हाल ही की बात है. महेशजी की अपने बड़े भई से कुछ रुपयों के लेन-देन को लेकर बहस हो गई और बात इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों ने रिश्ता ही तोड़ लिया. हुआ यूँ कि महेशजी की अपनी अलमारी में दो हज़ार रूपये रखे हुए थे. एक दिन महेशजी घर में नहीं थे और उनके बड़े भाई रमाकांत जी को रुपयों की जरुरत आन पड़ी, तो उन्होंने अलमारी में से छोटे भई से बगैर पूछे रूपये ले लिए. रमाकांतजी ने छोटे भाई से बगैर पूछे रूपये क्या ले लिए, छोटे भाई ने तो उन्हें चोर कह दिया और दोनों भाइयों के बीच ऐसी लड़ाई हुई कि खून के रिश्ते पलभर में टूट गए. जैसे इन दिनों भाइयों के रिश्ते पलभर में छोटी-सी बात पर टूट गए, उसी प्रकार कई और रिश्ते भी हैं, जो कभी-कभी छोटी सी बात पर टूट जाते हैं. लेकिन सच तो यह है कि छोटी- छोटी कड़वी बातों से अगर रिश्ते टूट जाते हैं तो कभी–कभी छोटी-सी मीठी व प्यारी बातों से रिश्ते टूटते-टूटते बच भी जाते हैं या यूं कह लीजिए कि टूटे हुए रिश्ते फिर से जुड़ भी जाते हैं...

प्रत्यक्ष रूप ही व्यक्तित्व का प्रथम परिचय होता है

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  मिसेज़ मेहरा दिल की बड़ी अच्छी महिला है. समाज सेविका है. अपने घर के नौकरों तक का भी बड़ा ख्याल रखती है. मुहल्ले में किसी के घर कोई बीमार पड़ जाए, तो बगैर बोले उसकी तीमारदारी करने को तैयार हो जाती हैं. किसी को कोई ऐसी जगह जाना है, जहाँ बच्चो को ले जाना उचित नहीं और घर में बच्चो को अकेला छोड़कर जाना खतरे से खाली नहीं, तो उनके बच्चो को बड़े प्यार से अपने घर में रख लेती हैं, यानि की मुहल्ले के लोगों से जब कोई मिसेज़ मेहरा का परिचय मांगता है, तो लोग कहते हैं, अजी! मिसेज़ मेहरा का क्या परिचय दें? वे तो बड़ी अच्छी महिला हैं. काफी भावुक व दयालु हैं. मगर एक ही कमी है उनमे, उनकी जुबान कैंची की तरह चलती है. दिल की जितनी साफ़ है, जुबान की उतनी ही कड़वी है. किसी को अच्छी बात के लिए भी डांटती है, तो ऐसा लगता है की उसकी जान ही ले लेंगी. मूड बिगड़ जाये तो बातचीत में गालियों का भी प्रयोग कर बैठती हैं. ख़ैर, ये तो हुई मिसेज़ महरा की बात. अब चलिये, मैं आपको क्लास वन अफसर वर्मा जी के बारे में कुछ बताती हूँ. वर्मा जी प्रोफेशन से एक बहुत बड़ी कम्पनी में उच्च अधिकारी हैं. पर जब तक वे अपना परिचय अपने प्रोफेशन के साथ क...

तारीफ करना भी एक कला है

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पिछले महीने चित्रा जी चेन्नई घुमने के लिए गयीं, तो वहां से अपनी पड़ोसन मधु जी के लिए एक खुबसूरत सी साड़ी लेकर आईं. मधु जी को साड़ी तो जरूर पसंद आयी, किंतु जितने प्रेम से चित्रा जी मधु जी के लिए साड़ी लायी थीं, उतने उत्साह से मधु जी ने साड़ी की तारीफ नहीं की, जिसके कारण चित्रा जी का मन बुझ-सा गया. उस दिन सोनू बड़ी मेहनत से नदियों और पहाड़ों के चित्र बनाकर अपने मम्मी-पापा को दिखाने उनके कमरे में गया. मम्मी टीवी देखने में मस्त थीं, इसलिए वो सोनू को यह कहकर पापा के पास भेज दी  कि अभी अपने पापा को चित्र दिखाओ, मैं बाद में देख लूंगी. पापा भी सोनू के बनाये चित्र को यूं ही एक सरसरी निगाह से देखकर उसे दूसरे कमरे में पढ़ने के लिए भेज दिये. बेचारा सोनू उदास होकर पढ़ने बैठ गया और सोचने लगा कि चित्र बनाते वक्त मैं सोच रहा था, कि मम्मी-पापा चित्र देखकर कितने खुश होंगे और मेरी तारीफ करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नही हो पाया. देखा जाए तो चित्रा जी या सोनू की तरह कितने ही लोग होते हैं, जो किसी से अपनी तारीफ सुनने की उम्मीद करते हैं, ऐसी स्थिति अगर सामने वाला व्यक्ति उनकी तारीफ न करे तो जाहिर है, उनका मन उद...

बोर करने वालों से कैसे बचें?

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कल दोपहर में मैं अर्चना जी के यहां गई तो देखी कि जयपुर से उनकी चाची जी हुई है. चूंकि मैं अर्चना जी के यहां किसी काम से सिर्फ 10 मिनट के लिए गई थी किंतु उनकी चाची के बार-बार आग्रह करने पर मुझे पूरे 2 घंटे उनके घर पर बैठना पड़ा. अब मैं क्या बताऊं कि इन 2 घंटों में अर्चना जी की चाची ने मुझे जयपुर शहर की बेहिसाब तारीफ तथा अपने घर के फिजूल किस्से सुना- सुना कर किस तरह बोर किया? वैसे मैं करती भी क्या आखिर वह बुजुर्ग थी. मैं उनका अपमान तो कर नहीं सकती थी, इसलिए चुपचाप मन मारकर उनकी बोर बातें सुनती रही. वर्मा साहब की आदत भी कोई कम बुरी नहीं है. वह एक ही बात को इतनी बार बोलते हैं कि सुनने वाला बुरी तरह से बोर हो  जाता है. जैन साहब डॉक्टर हैं, उनकी आदत है कि वह जब किसी के घर जाते हैं या पार्टी में जाते हैं तो इधर-उधर की बातें करते- करते अस्पताल एवं पेशेंट की बात पर आ जाते हैं. खानपान व सेहत पर इतना ज्यादा लेक्चर देना शुरू कर देते हैं कि लोग उनकी बातों से बोर होने लगते हैं. शिखा जी को तो पड़ोस की महिलाएं बोर वूमेन तक की उपाधि दे चुकी है. जानते हैं क्यों सिर्फ इसलिए कि शिखा जी जब किसी से बात क...