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सफलता प्राप्त करने के बाद का संघर्ष

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  आज आपको मेरे ब्लॉग के इस शीर्षक को पढ़ने के बाद कुछ अजीब सा लग रहा होगा। पक्की बात है कि आप सोच रहे होंगे कि भला सफलता प्राप्त करने के बाद कौन सा संघर्ष करना पड़ता है? सफलता प्राप्त करने के बाद तो बस ऐश मौज मस्ती और आराम होता है।  लेकिन अधिकांश लोगों के साथ ऐसा नही होता है। खासकर उनके साथ तो बिल्कुल भी नहीं, जो अपनी सफलता को बरकरार रखना चाहते हैं। ये बात हम सभी जानते हैं कि सफलता समय के साथ घटती- बढ़ती रहने वाली चीज है। फिर भी जो लोग चाहते हैं कि उनका नाम , उनकी पहचान अथवा उनकी कामयाबी समय के अनुरूप बनी रहे, तो इसके लिए उनको कठिन संघर्ष करना पड़ता है। क्योंकि वो सिर्फ़ आसपास के लोगों की नजर में ही नहीं बल्कि दूर दराज के लोगों के बीच भी अपनी खास जगह बना लेते हैं। अब उनके इन्हीं शुभचिंतकों के बीच कुछ ईर्ष्यालु शत्रु भी दोस्त, परिचित या फिर रिश्तेदार के रूप छुपे होते हैं, जो इस बात की ताक में लगे रहते हैं कि कब उनसे कोई भूल हो और वो उनकी खिंचाई करें। ऐसे लोग आपके जीवन में आपको नीचा दिखाने का कोई भी मौका नही चुकते हैं।  दूसरी तरफ देखा जाए तो अगर आप व्यवसायीं हैं , तो आपसे आ...

पढ़ाई करने की कोई उम्र नहीं होती

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हमारे देश में आज भी कई ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें युवावस्था में किसी कारणवश अपनी पढाई बीच में छोड़कर अर्थोपार्जन में लग जाना पड़ा या फिर उनकी शादी हो गयी. अब जबकि वो उम्र के मध्य पड़ाव (३५ -४० में ) पर पहुँच गई हैं और आर्थिक स्थिति भी बेहतर हो चुकी है तो उन्हें युवावस्था में छूटी हुई पढाई को पूरा करने की इच्छा होती है किन्तु संकोच उनका रास्ता रोक देती है. उन्हें मन की बात व्यक्त करने में कभी परिवार वालों से झेंप होती है तो कभी समाज के लोगों से शरम आती है.आज मेरा ये लेख उन्ही महिलाओं के लिए है. दरअसल सच तो यह है कि पढ़ने-लिखने की कोई उम्र सीमा नही होती है. आप किसी भी उम्र में अपनी शिक्षा पूरी कर सकती हैं. इसमें संकोच करने वाली कोई बात ही नहीं है. मेरे पड़ोस में ज्योति जी रहती हैं. इंटर करने के बाद उनकी शादी हो गयी थी. कई बार उन्होंने सोचा कि किसी प्रकार ग्रेजुएशन पूरा कर लूं. पर घर-गृहस्थी संभालने के चक्कर में कभी समय ही नहीं मिला कि पढाई कर पायें. अभी उनकी उम्र 51 वर्ष है. हाल ही में जब उनकी नई नवेली बहु को उनके मन की बात पता चली तो उसने उन्हें पहले तो मोटिवेट किया और फिर पति से बात करके अपन...

सादा जीवन उच्च विचार, स्वस्थ तन -मन का है आधार

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एक बात हर बच्चे को बचपन से पाठ्यपुस्तक के माध्यम से या घर के बड़े-बुजुर्गों के द्वारा अवश्य पढाई जाती है – “सादा जीवन उच्च विचार”. किन्तु पता नही क्यों बच्चे जैसे –जैसे उम्र के अलग –अलग पड़ावों से गुजरते हुए जीवन में आगे बढ़ते जाते है, वैसे –वैसे ये उतम विचार ना जाने कहाँ खोते चले जाते हैं और फिर ये विचार किसी भी व्यक्ति को जीवन के उस मोड़ पर याद आता है, जब उसके जीवन में आर्थिक समस्या उत्पन्न होने लगती है. अब यहाँ पर सोचने वाली बात यह है कि अगर जीवन के शुरुआत से ही इस उतम कथन का पालन पूरा परिवार करे तो ख़ास उम्र में इसे अपनाने कि जरुरत ही नही पड़ेगी. क्योंकि जो लोग “सादा जीवन उच्च विचार” को अपने जीवन जीने का आधार बना लेते हैं, वो शुरू से ही अपने घर-परिवार, संस्था, नाते –रिश्तेदार, दोस्त –परिचित सभी को अपने विचार के अनुकूल पाने अथवा बनाने का प्रयास करते हैं. अगर कोई उनके विचार के अनुकूल नही होता है, तो ऐसे लोग चुपचाप उस व्यक्ति से किनारा कर लेते हैं या काम भर रिश्ता रखते हैं. चूँकि आज के डिजीटल युग में कोई व्यक्ति “सादा जीवन उच्च विचार” को अपनाना नही चाहता है. स्टेट्स शो करना एक बीमारी की तरह...

किसी की चुप्पी को उसकी कमजोरी मानने की भूल ना करें

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हमारे घर -परिवार से लेकर देश -समाज सभी जगह अधिकाँश लोग चुप रहने वालों को कमजोर समझते हैं या फिर बहुत चालाक समझते हैं. बहुत ही कम लोग आपको ऐसे मिलेंगे, जो चुप रहने वालों को समझदार होने का खिताब देंगे. लेकिन आज इस लेख के माध्यम से मैं आपको अवश्य यह बताने का पूर्ण प्रयास करूंगी कि चुप रहने को जरा सकारात्मक ढंग से देखें और इसपर गहन विचार करें तो इसके कई फायदे आपके व्यक्तित्व को दब्बू नही बल्कि समझदार बनाने में सहयोग करेंगे.  ये तो हम सभी जानते हैं कि मेडिटेशन अथवा ध्यान लगाने से मन शांत होता है और मानसिक तनाव भी घटता है. अगर धर्म और संस्कृति की बात करें तो वहां भी चित को शांत और मौन रहने को विशेष महत्व दिया गया है. इसी शांत रहने के स्वभाव को अकसर सामान्य भाषा में लोग चुप रहना कहते हैं. अगर ऐसे लोग किसी अपमान का सामना चुप रहकर कर लें तो इन्हें दब्बू का नाम दे दिया जाता है या फिर कमजोर मानकर उन्हें आगे भी लोग अपमानित करते हैं, जबकि अधिकाँश बार उनके चुप या मौन रहने के पीछे बड़ी समझदारी छुपी होती हैं. उनको मालूम होता है कि कब, कहाँ, कितना और किसके साथ क्या बोलना है? चुप रहने वाले लोगों के ब...

जो पास है वही ख़ास है

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पूरब अपने कमरे में कान में इयर फोन लगाकर मोबाइल पर व्यस्त था और बगल के कमरे से उसकी छोटी चाची उसे आवाज दे रही थी. दरअसल चाची कमरें में पलंग से टकराकर गिर गयी थीं और सर पे चोट लग गयी थी. वो मदद के लिए पूरब को आवाज देती रहीं और पूरब कान में इयर फोन लगाकर अपने जर्मनी वाले दोस्त से चैट करने में व्यस्त रहा. वो तो भला हो बिट्टू का, जो अपनी छोटी -सी गेंद को पलंग के नीचे खोजने आया तो अपनी मम्मी को गिरा देखकर भागकर पूरब के पास गया और उसे खींचकर दूसरे कमरे में लेकर आया. पूरब ने जल्दी से चाचो को सौरी कहते हुए उठाया और उनकी मलहम -पट्टी किया. बाद में जब बाकि लोग घर के आये तो सारी बात बिट्टू से जानने के बाद पूरब को अच्छी -खासी डांट लगायें.  सच पूछिए तो आज के डिजीटल वर्ल्ड में यह कोई आश्चर्य की बात नही है कि लोग पास के लोगों को नजरंदाज करने लगे हैं और इंटरनेट के माध्यम से मिलने वाले दूर के लोगों को पास समझने लगे हैं. मैं इस बात से हरगिज इंकार नही करती हूँ कि इंटरनेट ने कई बिछुड़े हुए लोगों को मिलाने में अहम भूमिका निभाई है. सोशल मीडिया पर कई अच्छे मित्र व् शुभचिंतक भी लोगों को मिले हैं. कई लोगों क...

अतीत से भविष्य तक के सफर में

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  आज आप मेरे इस लेख के शीर्षक को पढ़कर ये बिलकुल मत समझिएगा कि मैं आपको कोई आध्यात्मिक लेख पढने को कहने वाली हूँ, क्योंकि आज की तारीख में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो आध्यात्मिक विषय पर चिन्तन करना पसंद करते हैं. लेकिन इस सच को भी आप नही नकार सकते हैं कि आध्यात्म हमे जीवन में असली आनंद की ओर ले जाता है.  आज मैं इस लेख में एक ऐसे विषय पर चर्चा कर रही हूँ या फिर कह लीजिये कि अपनी बात रख रही हूँ, जो कहीं ना कहीं आम व्यक्ति के जीवन से गहराई तक  जुड़ा हुआ विषय है. जैसे ही वर्तमान में कोई दुःख आता है, मानव अपने अतीत के उस पल में चला जाता है जिस पल में उसे आज की ही तरह किसी बड़े दुःख का सामना करना पड़ा था. इसके ठीक विपरीत अगर वर्तमान में कोई ख़ुशी प्राप्त होती है तो मानव तुरंत भविष्य के उस पल में चला जाता है जिसे उसने अभी दूर -दूर तक देखा भी नही है. यानि की एक आम मनुष्य कहीं ना कहीं अतीत से भविष्य तक के सफर में यात्रा करता रहता है और बीच में जो वर्तमान पल है उसकी महता को समझ नही पाता है. जबकि उसे अच्छी तरह से पता है कि अतीत कभी लौट कर नही आता है और भविष्य किसी का क्या होगा, ये कोई दावा नही...

छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से भी आत्मविश्वास बढ़ता है

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मनीष ग्यारवीं कक्षा का छात्र है। काफी अच्छा है वह पढ़ने में। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटी-बड़ी प्रतियोगिताओं में भी बराबर हिस्सा लेता रहता है। चाहे वो प्रतियोगिता उसके स्कूल में हो या रेडियो, टीवी, या फिर पत्र-पत्रिकाओं में हो, वह ज्यादातर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है। स्कूल में होने वाले कविता या निबंध प्रतियोगिता में तो वो हमेशा ही हिस्सा लेता है। चित्रकला प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेता है। कई बार प्रथम पुरस्कार मिलता है तो कई बार तृतीय पुरस्कार भी नहीं मिल पाता है। मगर मनीष हौसला नहीं हारता। वो फिर से प्रयास करता है। टी.वी./ रेडियो आदि पर जितने भी इनामी प्रतियोगिता वगैरह होते हैं, उनमें भी वो बखूबी हिस्सा लेता है। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी नाना प्रकार की प्रतियोगिता संबंधी स्तम्भ प्रकाशित होते हैं, उनमें भी वह अवश्य हिस्सा लेता है। मनीष के माता-पिता का कहना है कि, मनीष सिर्फ इनाम पाने के लिए तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेता है, बल्कि अपनी योग्यता व काबिलियत को परखने के लिए भी हर प्रकार की प्रतियोगिता में भाग लेता है। इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से आत्मविश्वास...

बात सिर्फ सलीके की है

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    कल मैं अनीता के घर गई तो देखी कि अनीता किचन में सब्जी बना रही है. मुझे आया हुआ देखकर वो जल्दी से चूल्हे का आँच कम करके और हाथ धो कर मेरे पास आकर बैठ गई. उसके हाथ पानी से भीगे हुए थे, इसलिए मैंने उसे हाथ पोछ लेने को कहा. इस पर उसने तुरंत वहीं पास की खिड़की में लगे पर्दे में हाथ पोछ लिया और मुझसे बात करने लगी. लेकिन मुझे यह बड़ा अजीब सा लगा. ऐसे ही एक दिन अपने बगल के पड़ोसी का बेटा बिट्टू खेलकूद कर शाम को घर आया तो उसकी मम्मी ने उसे हाथ पाँव  धो लेने को कहा. बिट्टू हाथ- पाँव  धोकर बाथरूम से निकला और एक सरसरी निगाह से उसने इधर उधर तौलिया ढूंढा. तौलिया नहीं मिला तो खटिया पर रखे छोटी बहन के फ्रॉक से ही उसने हाथ- पाँव  पोछ लिया. पुष्पा जी अक्सर कहीं बाहर जाते वक्त रुमाल लेना भूल जाती है. ऐसी स्थिति में अगर बाहर किसी होटल में खाना पड़ जाता है तो खाने के बाद हाथ में उन्हें अपनी साड़ी के आंचल से ही पोछना पड़ता है. देखा जाए तो करीब-करीब हर घर में ऐसा ही होता है, यानि की घर का कोई न कोई सदस्य इस प्रकार की आदतों का शिकार होता है. हाथ पोछने के लिए अगर तौलिया नहीं मिलता है...

संकोच त्याग कर पहल करना सीखिए

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 कल मिसेज शर्मा जब बाजार से पांच मीटर कपड़ा खरीद कर लायीं, तो घर में नापने पर वह कपड़ा चार मीटर सत्तर सेंटीमीटर ही निकला. दुकानदार की इस धोखेबाजी पर मिसेज शर्मा को बहुत गुस्सा आया. वे कई बार सोचीं की दुकानदार से जाकर इस बात की शिकायत करें, किंतु झिझक व संकोच के कारण  कि कहीं दुकानदार ही उन्हें कुछ उल्टा- सीधा न कह दे, इसलिए वो दुकानदार के पास गयी ही नहीं यानि की मिसेज शर्मा अपने संकोची स्वभाव के कारण दुकानदार से शिकायत नहीं कर पायीं. देखा जाए तो मिसेज शर्मा की तरह कितने ही लोग अपने संकोची स्वभाव के कारण अपना छोटा- मोटा नुकसान तो क्या कभी-कभी बड़ा नुकसान भी कर बैठते हैं. कुछ लोग तो इतने संकोची होते हैं कि डॉक्टर से अपनी कुछ ख़ास बीमारियों को भी बताने से झिझकते है, कई लोग कोई नया काम धंधा शुरु तो करना चाहते हैं, किंतु संकोची मन में कई प्रकार के विचार उठने लगते हैं. कभी लगता है कि समाज क्या कहेगा? कहीं लोग मेरा मजाक तो नहीं उड़ाएंगे? इसी झिझक व संकोची स्वभाव के कारण वे कोई भी काम- धंधा ठीक से शुरू नहीं कर पाते हैं. ऐसी स्थिति में वह मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं, जिसका प्रभाव उनक...