छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से भी आत्मविश्वास बढ़ता है

मनीष ग्यारवीं कक्षा का छात्र है। काफी अच्छा है वह पढ़ने में। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटी-बड़ी प्रतियोगिताओं में भी बराबर हिस्सा लेता रहता है। चाहे वो प्रतियोगिता उसके स्कूल में हो या रेडियो, टीवी, या फिर पत्र-पत्रिकाओं में हो, वह ज्यादातर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है। स्कूल में होने वाले कविता या निबंध प्रतियोगिता में तो वो हमेशा ही हिस्सा लेता है। चित्रकला प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेता है। कई बार प्रथम पुरस्कार मिलता है तो कई बार तृतीय पुरस्कार भी नहीं मिल पाता है। मगर मनीष हौसला नहीं हारता। वो फिर से प्रयास करता है। टी.वी./ रेडियो आदि पर जितने भी इनामी प्रतियोगिता वगैरह होते हैं, उनमें भी वो बखूबी हिस्सा लेता है। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी नाना प्रकार की प्रतियोगिता संबंधी स्तम्भ प्रकाशित होते हैं, उनमें भी वह अवश्य हिस्सा लेता है। मनीष के माता-पिता का कहना है कि, मनीष सिर्फ इनाम पाने के लिए तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेता है, बल्कि अपनी योग्यता व काबिलियत को परखने के लिए भी हर प्रकार की प्रतियोगिता में भाग लेता है। इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है। मनीष का ही एक दोस्त है रजत, जो कि इन छोटी-मोटी प्रतियोगिताओं में भाग लेने वालों पर हंसता है। उसका कहना है कि इन सब में सिर्फ समय बर्बाद होता है। जबकि रजत ताश खेलने में या दोस्तों के साथ गप्पे हाँककर समय बर्बाद करने या दिनभर मोबाइल पर गेम खेलने को बुरा नहीं समझता है।

12वीं कक्षा में पढ़ने वाले सूरज का कहना है कि मैं लकी ड्रॉ वाली प्रतियोगिता में हिस्सा क्यों लूं।  कोई जरूरी तो नहीं है कि मेरा ही ईनाम निकले। नीता के भाई समीर का कहना है कि पत्र-पत्रिकाओं में पचास-सौ रुपये के इनाम वाले प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर क्या होगा, उससे ज्यादा जेब खर्च हमारे मम्मी-पापा हमें हर महीने देते हैं। ग्यारवीं कक्षा में पढ़ने वाली रिचा पत्र-पत्रिकाओं वाली प्रतियोगिताओं में तो भाग ले लेती है, मगर स्कूल में होने वाली प्रतियोगिता में भाग लेने में उससे संकोच महसूस होता है।

लेकिन सच बात तो यह है की बच्चे को हर प्रकर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना चाहिए। जो बच्चे छोटी उम्र से ही छोटी-मोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर देते हैं, उन्हें आगे चलकर बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से डर नहीं लगता है। आज जबकि हमें कैरियर बनाने के लिए कितनी ही प्रतियोगिताएं देनी पड़ती है, तो क्यों ना आगे चलकर बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताएं को देने के लिए हम पहले से ही छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दें। रेडियो, टी.वी. या पत्र-पत्रिकाओं में अकसर ज्ञान-विज्ञान, इतिहास, भूगोल, राजनीति, खेलकूद, फिल्म, आदि से संबंधित प्रश्न प्रतियोगिता में पूछे जाते हैं इन विषयों से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने से हमारा सामान्य ज्ञान बढ़ता है। अगर इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में इनाम दिया जाता है तो इसका मतलब या नहीं है कि यह इनाम प्रतियोगियों को लालच देने के लिए दिया जाता है। यह ईनाम तो प्रतियोगियों के हौसलों को बढ़ाने के लिए दिया जाता है। स्कूल कॉलेज में होने वाली तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में भी अवश्य हिस्सा लेना चाहिए। इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में शामिल होने से संकोच खत्म होता है, तथा आत्मविश्वास बढ़ता है। अत:बच्चों को चाहिए, कि वह बड़े होकर भविष्य में बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताएं देने के लिए छोटी उम्र से ही छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दें, ताकि उनके मन में संकोच और भय की जगह आत्मविश्वास की वृद्धि हो और वह अपनी योग्यता और काबिलियत का सही इस्तेमाल कर सकें।लेकिन प्रतियोगिता छोटी हो या बड़ी आपको इसकी जानकारी अपने पेरेंट्स को अवश्य देनी चाहिए, ताकि आपको इसके लिए उनका भी सही मार्गदर्शन मिले, क्योंकि आज के डिजीटल युग में कई लोग अथवा संस्थाएं सही मायने में किसी प्रकार की प्रतियोगिता का आयोजन नही करती हैं. बस चुपचाप पैसा ऐंठकर भाग जाती हैं. पेरेंट्स के नॉलेज में बात देकर कोई काम करने से हम इस प्रकार की ठगी से बच सकते हैं.

लेखन- आकांक्षा राज

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