बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं

ये सिर्फ कहने की बात नही है कि बूढ़े और बच्चे एक समान होते हैं, बल्कि ये मानव जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई भी है. बुढ़ापा को मानव जीवन संध्या काल भी कहा  जाता है. यही वो वक्त है जब बुजुर्गों को अपने बसाए हुए परिवार यानि के अपने बच्चों के प्यार व् देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. अपने अनुभव के आधार पर मैं तो कहती हूँ कि इन्हें एक छोटे बच्चे जैसी केयर की जरूरत होती है बुढ़ापे में. लेकिन आज के डिजीटल वर्ल्ड में हमारा समाज आधुनिक नही अतिआधुनिकता की होड़ में अपने ही बच्चे के केयर के लिए समय नही निकाल पा रहा है तो बूढ़े माता -पिता के लिए समय कहाँ से लाएगा? बढती हुई महंगाई ने अधिकाँश घरों में पति -पत्नी दोनों को कमाने में व्यस्त कर दिया है, जिसका सीधा बुरा असर कई घर -परिवार में बच्चों और बूढों दोनों पर ही पड़ा है. फिर भी माता -पिता होने के कारण अपने बच्चों की जिन्दगी के लिए  पति -पत्नी एड़ी -छोटी एक कर देते हैं. लेकिन इन सबके बीच कहीं ना कहीं अपने बुजुर्ग माता -पिता की इच्छाओं अथवा आवश्यकताओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जिसका नकारात्मक प्रभाव बुजुर्ग माता -पिता पर यदि पड़ गया तो बेटे -बहु को भी कारण खोजने के लिए किसी मन:चिकित्सक की शरण में जाना पड़ जाता है.पारिवारिक वातावरण तनावपूर्ण बनने लगता है. कई बार तो परिवार में ऐसा भी देखा जाता है कि पत्नी हाउस वाइफ है और पूरे समय घर पर ही रहती है या पति का व्यापार आदि घर -मकान के ही किसी पार्ट में है. बच्चे -बूढ़े सभी नजर के सामने हैं किन्तु उनकी देखभाल को लेकर परिवार के सदस्यों के बीच अनबन होती रहती है. यानि की ये बातें साबित करती हैं कि बुजुर्गों की सही रूप में देखभाल करने के लिए बस कुछ ख़ास बातों को ध्यान रखा जाये तो कभी भी बुजुर्गों के मन में जीवन के प्रति नाकारात्मक विचार नही आयेंगे और वो जीवन संध्या में भी मुस्कुराएंगे. तो आइये कुछ ख़ास बातों पर अमल  किया जाये -

 1. अपनी घरेलू परिस्थिति को इस प्रकार का बनाने का प्रयास कीजिये कि बुजुर्गों को घर पर बार -बार अकेला छोड़ने की नौबत ना आये. क्योंकि बुढापे में शरीर कमजोर तो हो ही जाता है, साथ ही  शारीरिक रूप से कई बीमारियाँ भी हो जाती है. ऐसे में कई बार वो अपने दैनिक कार्यों को भी ठीक से नही कर पाते हैं.ऐसे में उन्हें घर पर अकेला छोड़कर आपका देर तक कहीं जाना तो खतरनाक हो ही सकता है. कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि थोड़े देर के अकेलापन में भी बुजुर्ग कोई ऐसी बात सोच जाते हैं कि अचानक से हार्टफेल हो जाता है. इसलिए इन्हें घर पर अकेला छोड़ने से पहले सारी बातों पर बारीकी से अवश्य सोचें.

 2. अपने घर के बुजुर्गों को स्वस्थ रखने के लिए उनके खान -पान और दवा के साथ- साथ उन्हें योगा और एक्सरसाइज़ करने के लिए भी प्रेरित करें. उनकी दिनचर्या उम्र के अनुसार जरुर आपसे अलग होगी, फिर भी आप कोशिश अवश्य कीजिये कि वो लोग भी आपके साथ योग अथवा एक्सरसाइज़ करें.

 3. ओल्ड एज की एक आम समस्या है बात या फिर कोई चीज भूल जाने की. ऐसे में जरुरी है कि आप उनके मेंटल हेल्थ का भी ध्यान रखें. इसके लिए आप उनसे मन ना भी लगे तो कुछ -कुछ बातें करते रहें. यादाश्त ज्यादा कमजोर होती हुई लगे तो किसी अच्छे मन:चिकित्सक से चेकअप भी करवाएं.  उन्हें बाहर बाजार जाने की इच्छा हो या पार्क आदि जाने का मन करें तो अकेला ना जाने दें. अपने साथ ले जाएँ.

4. बुढापे में स्वयं को व्यस्त रखने के लिए वो अपने पसंद का कोई काम करना चाहें तो इसके लिए उन्हें सहयोग करें. आपका मोटिवेशन उन्हें साकारात्मक दिशा में देखने की प्रेरणा देगा.

5.घर -परिवार को कोई ख़ास समस्या की वजह से तनावपूर्ण माहौल बन रहा हो तो घर के बुजुर्गों को भी उसमे मौका देखकर शामिल कीजिये और उनके अनमोल अनुभव का लाभ लीजिये. हो सकता है कि उनके कहे अनुसार कोई फैसला लेने पर चुटकी में आपकी समस्या सुलझ जाये.  

6.वीकेंड में घर के बुजुर्गों को भी अपने साथ घुमाने -फिराने ले जाइए. अगर उन्हें चलने में दिक्कत होती है तो सहारा देकर ले जाइए या इसका कोई उपाय खोजिये किन्तु अपने साथ उन्हें भी जीवन संध्या में जीने का मजा लेने दीजिये.

7. अपने बच्चों को भी दादा -दादी , नाना -नानी के साथ उठने -बैठने, खाने -पीने , सोने -जागने की स्वतंत्रता दीजिये. इसका काफी अच्छा फायदा होता है. बच्चे बुजुर्गों के जीवन के उतार- चढाव को स्वयं महसूस करते हैं तो जीवन में व्यावहारिकता ज्यादा सीखते हैं और बुजुर्गों को पोते -पोतियों या नाती -नातिनों के साथ असीम लगाव का अनुभव होता है.

चित्रांकन - रश्मि पाठक

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