संकोच त्याग कर पहल करना सीखिए


 कल मिसेज शर्मा जब बाजार से पांच मीटर कपड़ा खरीद कर लायीं, तो घर में नापने पर वह कपड़ा चार मीटर सत्तर सेंटीमीटर ही निकला. दुकानदार की इस धोखेबाजी पर मिसेज शर्मा को बहुत गुस्सा आया. वे कई बार सोचीं की दुकानदार से जाकर इस बात की शिकायत करें, किंतु झिझक व संकोच के कारण  कि कहीं दुकानदार ही उन्हें कुछ उल्टा- सीधा न कह दे, इसलिए वो दुकानदार के पास गयी ही नहीं यानि की मिसेज शर्मा अपने संकोची स्वभाव के कारण दुकानदार से शिकायत नहीं कर पायीं.

देखा जाए तो मिसेज शर्मा की तरह कितने ही लोग अपने संकोची स्वभाव के कारण अपना छोटा- मोटा नुकसान तो क्या कभी-कभी बड़ा नुकसान भी कर बैठते हैं. कुछ लोग तो इतने संकोची होते हैं कि डॉक्टर से अपनी कुछ ख़ास बीमारियों को भी बताने से झिझकते है, कई लोग कोई नया काम धंधा शुरु तो करना चाहते हैं, किंतु संकोची मन में कई प्रकार के विचार उठने लगते हैं. कभी लगता है कि समाज क्या कहेगा? कहीं लोग मेरा मजाक तो नहीं उड़ाएंगे? इसी झिझक व संकोची स्वभाव के कारण वे कोई भी काम- धंधा ठीक से शुरू नहीं कर पाते हैं. ऐसी स्थिति में वह मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं, जिसका प्रभाव उनके संपूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ता है

जो व्यक्ति संकोची स्वभाव के होते हैं यानि जो व्यक्ति पहल करना नहीं जानते हैं, वे जीवन के कई क्षेत्रों में पीछे रह जाते हैं. अब रीमा को ही ले लीजिए. रीमा बहुत ही अच्छा गाती थी, पर कॉलेज में होने वाले किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम अपने संकोची स्वभाव के कारण नही गाती थी. उसे लगता था कि कहीं मेरे गाने को कोई हँस न दे. इसलिए हर बार कॉलेज का जलसा बीत जाता और रीमा  गाने की बात सोचती ही रह जाती. संकोची स्वभाव ने रीमा की गायन प्रतिभा को निखरने नही दिया.

अक्सर देखा जाता है कि जो लोग संकोची नहीं होते हैं, वह बिगड़ती हुई बात को भी संभाल लेते हैं. इस बात पर मुझे एक और किस्सा याद आ रहा है. बात पिछले ही महीने की है. दफ्तर में नीरज का अपनी किसी महिला सहकर्मी से छोटी- सी बात पर बहसा- बहसी हो गई. इस बहसा- बहसी के बाद दोनों के बीच बातचीत भी बंद हो गयी. दो- चार दिन बाद दोनों को ही लगने लगा कि इस तरह से छोटी सी बात पर बहस करके बच्चों की तरह बातचीत बंद करना ठीक नहीं, किंतु दोनों ही इस उलझन में थे कि पहले बात करने की पहल कौन करे? क्योंकि दोनों को ही बात शुरू करने में संकोच महसूस हो रहा था. अंत में संकोच त्यागकर नीरज ने ही  बात करने की पहल की. जिसका नतीजा यह हुआ कि वे दोनों फिर से अच्छे मित्र बन गए. इस प्रकार यदि हम संकोच की आदत को छोड़कर पहल करने की आदत डाल लें, तो हमारे सामाजिक संबंधों का दायरा दो विस्तृत होगा ही साथ ही हमारी कई छोटी- बड़ी समस्याएं भी पल भर में सुलझ जाएँगी.

एक और वाक्या देखें. कई बार ऐसा भी होता है कि किसी पार्टी, शादी- विवाह या सफर में कोई व्यक्ति आपको बहुत अच्छा लगता है. उससे बात करने की आपको बहुत इच्छा होती है, किंतु संकोच आपको पहल करने से रोक देता है. आप मन मसोसकर रह जाते है. लेकिन जो व्यक्ति संकोची स्वभाव के नहीं होते हैं, वे किसी न किसी बहाने मित्रता कर ही लेते हैं. इस मामले में नमिता जी का जवाब नहीं. अगर किसी पार्टी या समारोह वगैरह में उन्हें कोई महिला अच्छी लगती है तो वे बेझिझक उसके पास चली जाती है और बनावटी बातों का सहारा लेकर बातचीत शुरू कर देती है, जैसे कि आज मौसम कल की अपेक्षा ज्यादा ठीक लग रहा है, यह मेरी घड़ी बंद हो गई है प्लीज जरा टाइम तो बताइएगा आदि. ऐसे लोगों का सामाजिक दायरा काफी विस्तृत होता है. अत: आप भी आज से ही

संकोच त्यागकर पहल कीजिए और अपना सामाजिक दायरा बढ़ाइए.

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