किसी की चुप्पी को उसकी कमजोरी मानने की भूल ना करें
हमारे घर -परिवार से लेकर देश -समाज सभी जगह अधिकाँश लोग चुप रहने वालों को कमजोर समझते हैं या फिर बहुत चालाक समझते हैं. बहुत ही कम लोग आपको ऐसे मिलेंगे, जो चुप रहने वालों को समझदार होने का खिताब देंगे. लेकिन आज इस लेख के माध्यम से मैं आपको अवश्य यह बताने का पूर्ण प्रयास करूंगी कि चुप रहने को जरा सकारात्मक ढंग से देखें और इसपर गहन विचार करें तो इसके कई फायदे आपके व्यक्तित्व को दब्बू नही बल्कि समझदार बनाने में सहयोग करेंगे.
ये तो हम सभी जानते हैं कि मेडिटेशन अथवा ध्यान लगाने से मन शांत होता है और मानसिक तनाव भी घटता है. अगर धर्म और संस्कृति की बात करें तो वहां भी चित को शांत और मौन रहने को विशेष महत्व दिया गया है. इसी शांत रहने के स्वभाव को अकसर सामान्य भाषा में लोग चुप रहना कहते हैं. अगर ऐसे लोग किसी अपमान का सामना चुप रहकर कर लें तो इन्हें दब्बू का नाम दे दिया जाता है या फिर कमजोर मानकर उन्हें आगे भी लोग अपमानित करते हैं, जबकि अधिकाँश बार उनके चुप या मौन रहने के पीछे बड़ी समझदारी छुपी होती हैं. उनको मालूम होता है कि कब, कहाँ, कितना और किसके साथ क्या बोलना है? चुप रहने वाले लोगों के बारे में कई मनोवैज्ञानिकों का भी कहना है कि ऐसे लोगों का कॉन्फिडेंस लेवल अच्छा होता है. कॉन्सेंट्रेशन पावर भी बेहतरीन होता है. चुप या शांत रहने पर आपको अपने आपसे भी कुछ बात करने का मौका मिलता है, जिसे ‘चिंतन अथवा मनन’ करना कहते हैं. चिन्तन अथवा मनन करने से हमारा दिमाग नये विचारों पर मंथन करता है, जिसका परिणाम प्राय: सकारात्मक होता है. इसलिए आप प्रतिदिन अकेले में कुछ देर चुप रहकर अवश्य बिताएं.
आज की तारीख में हर व्यक्ति जीवन की भाग- दौड़ से परेशान है. जिससे अकस्मात छोटी -सी बात पर भी व्यक्ति को तेज क्रोध आ जाता है. कुछ देर चुप रहने से तनाव पैदा करने वाले हारमोंस के लेवल में धीरे -धीरे कमी आती जाती है. दिमाग शांत होते ही क्रोध नियंत्रित हो जाता है. डॉक्टर्स का भी कहना है कि अक्सर ज्यादा बोलने से और शोर- शराबे वाले माहौल में रहने से सामान्य व्यक्ति का स्वभाव भी चिडचिडा हो जाता है, क्योंकि उसके ब्रेन की कोशिकाएं कमजोर पड़ने लगती हैं. धीरे -धीरे ये कोशिकाएं मृतावस्था में भी आ जाती हैं. इसलिए हमे अपने स्वभाव को लोगों के साथ मिलनसार अवश्य रखना चाहिए किन्तु बेमतलब का अधिक नही बोलना चाहिए. उचित समय पर उचित समय तक चुप यानि की मौन रहने से हमारे दिमाग की सेल्स दोबारा बनने लगती है और हम स्वयं को दिमागी रूप से तरोताजा महसूस करने लगते हैं. ऐसे में हम कोई भी कार्य उत्साह से करते हैं. हमारी क्रियेटिविटी भी इससे बढती है. चुप रहने वाले लोग कोई भी बात गहराई से सोचते हैं. उन्हें पता होता है कि मौके और माहौल के अनुसार कब कितना बोलना है कि कोई भी बात बने नही तो कम से कम और बिगड़े भी नही. चुप रहने वाले लोग सहनशील होते हैं. उन्हें बात -बात पर दुःख नही पहुँचता है, क्योंकि वो अपनी बुद्धिमता से किसी भी बात को तह तक सोचते हैं. इन्हें चुप रहकर अपने हक के लिए सही तरीके से लड़ना भी आता है और मौके की नाजुकता को समझते हुए समझौता करना भी आता है. ये किसी के बहकावे में शायद ही आते हैं.
लेख के अंत में मैं चुप रहने वाले उनलोगों का भी जिक्र करना चाहूंगी जो अपनी उलझनपूर्ण बात अपने किसी निकट दोस्त या रिश्तेदार के साथ भी शेयर नही कर पाते हैं. घुटते रहते हैं. अपने आप में सिमटकर अपने जीवन को बोझिल बना लेते हैं. जिन्दगी के बोझ को कम करने के लिए नशा का सहारा लेने लगते हैं या जीवन लीला ही समाप्त कर लेते हैं. चुप रहने से अथवा मौन रहने से मेरा अर्थ सिर्फ यह है कि आप अपनी सकारात्मक उर्जा को अपने भीतर इकट्ठा करना सीखिए, क्योंकि कम बोलना या चुप रहना भी आपके अंदर सकारात्मक उर्जा भरने का उतम स्रोत है.

हर तरह से उपयोगी लेख।
जवाब देंहटाएंहर तरह से उपयोगी लेख। व्यवहारिक और वैज्ञानिक तरीकों से बात को स्पष्ट रूप से आपने बखूबी समझाया है।
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