बोर करने वालों से कैसे बचें?
कल दोपहर में मैं अर्चना जी के यहां गई तो देखी कि जयपुर से उनकी चाची जी हुई है. चूंकि मैं अर्चना जी के यहां किसी काम से सिर्फ 10 मिनट के लिए गई थी किंतु उनकी चाची के बार-बार आग्रह करने पर मुझे पूरे 2 घंटे उनके घर पर बैठना पड़ा. अब मैं क्या बताऊं कि इन 2 घंटों में अर्चना जी की चाची ने मुझे जयपुर शहर की बेहिसाब तारीफ तथा अपने घर के फिजूल किस्से सुना- सुना कर किस तरह बोर किया? वैसे मैं करती भी क्या आखिर वह बुजुर्ग थी. मैं उनका अपमान तो कर नहीं सकती थी, इसलिए चुपचाप मन मारकर उनकी बोर बातें सुनती रही.
वर्मा साहब की आदत भी कोई कम बुरी नहीं है. वह एक ही बात को इतनी बार बोलते हैं कि सुनने वाला बुरी तरह से बोर हो जाता है. जैन साहब डॉक्टर हैं, उनकी आदत है कि वह जब किसी के घर जाते हैं या पार्टी में जाते हैं तो इधर-उधर की बातें करते- करते अस्पताल एवं पेशेंट की बात पर आ जाते हैं. खानपान व सेहत पर इतना ज्यादा लेक्चर देना शुरू कर देते हैं कि लोग उनकी बातों से बोर होने लगते हैं. शिखा जी को तो पड़ोस की महिलाएं बोर वूमेन तक की उपाधि दे चुकी है. जानते हैं क्यों सिर्फ इसलिए कि शिखा जी जब किसी से बात करती है तो स्वयं ही बोलती रहती है, सामने वाले को बोलने का मौका ही नहीं देती हैं. अगर सामने वाला कुछ बोल रहा हो तो उसे बीच में टोक कर अपनी बात शुरू कर देती है. अपनी हर बात यूँ बढ़ा- चढ़ाकर बोलती है कि क्या बताएं? उनकी बातों से लोग बुरी तरह बोर हो जाते हैं. दीपा जी की पड़ोसन सरला जी का भी क्या कहना. सरला जी की खास आदत है कि वह पड़ोस की सारी खबर इकट्ठा करके दीपा जी के घर पहुंच जाती हैं और सबके किस्से नमक- मिर्च लगाकर यूँ बताना शुरु करती है कि दीपा जी को सिर में दर्द हो जाता है. निक्की अक्सर कहती है कि जिस दिन घर में दादा जी टीवी देखने बैठ जाए उस दिन मैं चैन से टीवी नहीं देख पाती हूं. खासकर तब जब उनके जमाने की कोई पुरानी फिल्म टीवी पर आ रही हो. पुरानी फिल्म देखते-देखते दादाजी अपने जमाने में चल जाते हैं और फिल्म के बीच में ही अपने जमाने के किस्से सुनाने लगते हैं जिसके कारण फिल्म देखने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है.
इस प्रकार देखा जाए तो हमारे घर से लेकर अड़ोस- पड़ोस तथा नाते-रिश्तेदार तक में ऐसे लोग भरे होते हैं जो अपनी फिजूल बातों से हमें बोर करने में कोई कसर नही छोड़ते हैं. किन्तु अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसे बोर करने वाले लोगों से पीछा कैसे छुड़ाया जाए? अगर अपने घर- परिवार में हमें कोई अपनी बातों से बोर करता है तो हम बिना कुछ सोचे समझे उसे डांट देते हैं या चुप हो जाने को कहते हैं, किंतु बाहर वालों को ऐसी स्थिति में हम कुछ नहीं कह पाते. उनकी बोर बातें चुपचाप सुनते रहते हैं किंतु थोड़ा बुद्धिमानी से काम लेकर काफी हद तक इनकी बोर बातों से हम अच्छी तरह बच सकते हैं. उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि आप अपने किसी दोस्त या सहेली से बात कर रही हो और कुछ देर के बाद आपको लगने लगे कि उसकी बातों से आप बोर हो रही हैं तो अपने हाव-भाव या मूड द्वारा उन्हें यह समझाने का प्रयास कीजिए कि उनकी बातों से अब आप बोर हो रही है. यदि आपकी सहेली आपके अनमने मूड का इशारा भी न समझे और उनकी बोर बातों का सिलसिला यूं ही जारी रहे तो आप बात का विषय बदलने की कोशिश कीजिए. अगर यह दोनों उपाय नाकाम हो जाए तो फिर कोई अच्छा- सा बहाना बनाकर वहां से उठ जाने में ही भलाई है.
यह कोई जरूरी नहीं कि हर बार कोई दूसरा ही हमें अपनी बातों से बोर करता है. कई बार ऐसा भी होता है कि हम स्वयं भी किसी को अपनी बातों से बोर कर रहे होते हैं, लेकिन हमें इसका पता नहीं होता है. इसलिए हमे स्वयं भी इस बात का ख्याल हर जगह रखना चाहिए कि कोई हमारी बातों से बोर होकर हमें बोर का नाम ना दे बैठे. इसके लिए बहुत जरूरी है कि किसी से बात करते वक्त हमें उसके चेहरे का हाव- भाव या मूड को पढ़ते रहना चाहिए. यदि एक बार भी ऐसा लगे कि सामने वाला हमारी बातें मन से नही सुन रहा है तो हमें अपनी बात वहीं पर समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिए. एक ही बात को बार-बार नहीं बोलना चाहिए. इससे उस बात की वैल्यू तो कम हो ही जाती है, साथ ही साथ लोग हमें पीठ पीछे पागल कहने से भी नहीं चूकते. अपने घर गृहस्ती की बातों में हमें रुचि हो सकती है, लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि दूसरों को भी हमारे घर की अच्छी बातों में रुचि हो, इसलिए अपने घर गृहस्थी की बातें हमेशा दूसरों के सामने करके उन्हें बोर मत कीजिए. इस प्रकार थोड़ा- बहुत ध्यान रख कर चाहें तो हम खुद भी किसी की बोर बातों से बच सकते हैं और स्वयं भी इस आदत से पीछा छुड़ा सकते हैं.
तस्वीर –हमारे सप्तरंग स्टूडियो से (आर्टिस्ट –रश्मि पाठक)
वर्मा साहब की आदत भी कोई कम बुरी नहीं है. वह एक ही बात को इतनी बार बोलते हैं कि सुनने वाला बुरी तरह से बोर हो जाता है. जैन साहब डॉक्टर हैं, उनकी आदत है कि वह जब किसी के घर जाते हैं या पार्टी में जाते हैं तो इधर-उधर की बातें करते- करते अस्पताल एवं पेशेंट की बात पर आ जाते हैं. खानपान व सेहत पर इतना ज्यादा लेक्चर देना शुरू कर देते हैं कि लोग उनकी बातों से बोर होने लगते हैं. शिखा जी को तो पड़ोस की महिलाएं बोर वूमेन तक की उपाधि दे चुकी है. जानते हैं क्यों सिर्फ इसलिए कि शिखा जी जब किसी से बात करती है तो स्वयं ही बोलती रहती है, सामने वाले को बोलने का मौका ही नहीं देती हैं. अगर सामने वाला कुछ बोल रहा हो तो उसे बीच में टोक कर अपनी बात शुरू कर देती है. अपनी हर बात यूँ बढ़ा- चढ़ाकर बोलती है कि क्या बताएं? उनकी बातों से लोग बुरी तरह बोर हो जाते हैं. दीपा जी की पड़ोसन सरला जी का भी क्या कहना. सरला जी की खास आदत है कि वह पड़ोस की सारी खबर इकट्ठा करके दीपा जी के घर पहुंच जाती हैं और सबके किस्से नमक- मिर्च लगाकर यूँ बताना शुरु करती है कि दीपा जी को सिर में दर्द हो जाता है. निक्की अक्सर कहती है कि जिस दिन घर में दादा जी टीवी देखने बैठ जाए उस दिन मैं चैन से टीवी नहीं देख पाती हूं. खासकर तब जब उनके जमाने की कोई पुरानी फिल्म टीवी पर आ रही हो. पुरानी फिल्म देखते-देखते दादाजी अपने जमाने में चल जाते हैं और फिल्म के बीच में ही अपने जमाने के किस्से सुनाने लगते हैं जिसके कारण फिल्म देखने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है.
इस प्रकार देखा जाए तो हमारे घर से लेकर अड़ोस- पड़ोस तथा नाते-रिश्तेदार तक में ऐसे लोग भरे होते हैं जो अपनी फिजूल बातों से हमें बोर करने में कोई कसर नही छोड़ते हैं. किन्तु अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसे बोर करने वाले लोगों से पीछा कैसे छुड़ाया जाए? अगर अपने घर- परिवार में हमें कोई अपनी बातों से बोर करता है तो हम बिना कुछ सोचे समझे उसे डांट देते हैं या चुप हो जाने को कहते हैं, किंतु बाहर वालों को ऐसी स्थिति में हम कुछ नहीं कह पाते. उनकी बोर बातें चुपचाप सुनते रहते हैं किंतु थोड़ा बुद्धिमानी से काम लेकर काफी हद तक इनकी बोर बातों से हम अच्छी तरह बच सकते हैं. उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि आप अपने किसी दोस्त या सहेली से बात कर रही हो और कुछ देर के बाद आपको लगने लगे कि उसकी बातों से आप बोर हो रही हैं तो अपने हाव-भाव या मूड द्वारा उन्हें यह समझाने का प्रयास कीजिए कि उनकी बातों से अब आप बोर हो रही है. यदि आपकी सहेली आपके अनमने मूड का इशारा भी न समझे और उनकी बोर बातों का सिलसिला यूं ही जारी रहे तो आप बात का विषय बदलने की कोशिश कीजिए. अगर यह दोनों उपाय नाकाम हो जाए तो फिर कोई अच्छा- सा बहाना बनाकर वहां से उठ जाने में ही भलाई है.
यह कोई जरूरी नहीं कि हर बार कोई दूसरा ही हमें अपनी बातों से बोर करता है. कई बार ऐसा भी होता है कि हम स्वयं भी किसी को अपनी बातों से बोर कर रहे होते हैं, लेकिन हमें इसका पता नहीं होता है. इसलिए हमे स्वयं भी इस बात का ख्याल हर जगह रखना चाहिए कि कोई हमारी बातों से बोर होकर हमें बोर का नाम ना दे बैठे. इसके लिए बहुत जरूरी है कि किसी से बात करते वक्त हमें उसके चेहरे का हाव- भाव या मूड को पढ़ते रहना चाहिए. यदि एक बार भी ऐसा लगे कि सामने वाला हमारी बातें मन से नही सुन रहा है तो हमें अपनी बात वहीं पर समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिए. एक ही बात को बार-बार नहीं बोलना चाहिए. इससे उस बात की वैल्यू तो कम हो ही जाती है, साथ ही साथ लोग हमें पीठ पीछे पागल कहने से भी नहीं चूकते. अपने घर गृहस्ती की बातों में हमें रुचि हो सकती है, लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि दूसरों को भी हमारे घर की अच्छी बातों में रुचि हो, इसलिए अपने घर गृहस्थी की बातें हमेशा दूसरों के सामने करके उन्हें बोर मत कीजिए. इस प्रकार थोड़ा- बहुत ध्यान रख कर चाहें तो हम खुद भी किसी की बोर बातों से बच सकते हैं और स्वयं भी इस आदत से पीछा छुड़ा सकते हैं.
तस्वीर –हमारे सप्तरंग स्टूडियो से (आर्टिस्ट –रश्मि पाठक)

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