तारीफ करना भी एक कला है

पिछले महीने चित्रा जी चेन्नई घुमने के लिए गयीं, तो वहां से अपनी पड़ोसन मधु जी के लिए एक खुबसूरत सी साड़ी लेकर आईं. मधु जी को साड़ी तो जरूर पसंद आयी, किंतु जितने प्रेम से चित्रा जी मधु जी के लिए साड़ी लायी थीं, उतने उत्साह से मधु जी ने साड़ी की तारीफ नहीं की, जिसके कारण चित्रा जी का मन बुझ-सा गया.

उस दिन सोनू बड़ी मेहनत से नदियों और पहाड़ों के चित्र बनाकर अपने मम्मी-पापा को दिखाने उनके कमरे में गया. मम्मी टीवी देखने में मस्त थीं, इसलिए वो सोनू को यह कहकर पापा के पास भेज दी  कि अभी अपने पापा को चित्र दिखाओ, मैं बाद में देख लूंगी. पापा भी सोनू के बनाये चित्र को यूं ही एक सरसरी निगाह से देखकर उसे दूसरे कमरे में पढ़ने के लिए भेज दिये. बेचारा सोनू उदास होकर पढ़ने बैठ गया और सोचने लगा कि चित्र बनाते वक्त मैं सोच रहा था, कि मम्मी-पापा चित्र देखकर कितने खुश होंगे और मेरी तारीफ करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नही हो पाया.

देखा जाए तो चित्रा जी या सोनू की तरह कितने ही लोग होते हैं, जो किसी से अपनी तारीफ सुनने की उम्मीद करते हैं, ऐसी स्थिति अगर सामने वाला व्यक्ति उनकी तारीफ न करे तो जाहिर है, उनका मन उदास हो जाता है,

वैसे कोई व्यक्ति किसी की तारीफ करने में क्यों कंजूसी कर जाता है या फिर किसी की तारीफ उत्साहित होकर क्यों नहीं कर पाता है, इसके पीछे कुछ कारण हैं.  जैसे कि कुछ लोग तारीफ करना भूल जाते हैं तो कुछ लोग ईर्ष्या से तारीफ नहीं करते. कुछ लोग तारीफ करके किसी का भाव नहीं बढ़ाना चाहते हैं तो कुछ लोगों को खुशी व उत्साह से तारीफ करना ही नहीं आता. खैर तारीफ ना  करने की वजह चाहे जो भी हो,  किंतु यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि तारीफ तीन अक्षर का छोटा-सा शब्द जरूर है, किंतु यह छोटा -सा शब्द दूसरों को तो खुश करता ही है, साथ ही आपको भी उनकी नजर में उठाता है.

उदाहरणस्वरूप मान लीजिए कि आप अपनी किसी सहेली के घर गयीं और आपकी सहेली आपके लिए कोई नया व्यंजन बड़े प्रेम से बनाती है, किंतु आपको उस नये व्यंजन का स्वाद अच्छा नहीं लगता है, जबकि आपकी सहेली आपसे उस व्यंजन को बार-बार खाने का आग्रह कर रही है. जाहिर है कि आपकी सहेली आपके मुंह से अपने बनाये नये व्यंजन की तारीफ सुनना चाहती है. ऐसी स्थिति में आपको थोड़ी -सी बुद्धि से काम लेना चाहिए. अगर आप खाने से एकदम इनकार कर देंगी, तो यह शिष्टाचार के विरूद्ध तो होगा ही, साथ ही आपकी सहेली को भी दुख लग सकता है. इसलिए नये व्यंजन को थोड़ा-सा चखने के बाद आप मुस्कुराती हुई कहे कि तुम नया व्यंजन तो सचमुच बहुत अच्छा बनायी हो,  फिर भी इसका टेस्ट -डेवलप होने में अभी और समय लगेगा. आपके ऐसा कहने से आपकी सहेली स्वयं समझ जाएगी कि आपको व्यंजन बहुत अच्छा नहीं लग रहा है और वह आपको बार-बार खाने का आग्रह नहीं करेंगी.

किसी की तारीफ करते वक्त इस बात का भी खास ख्याल रखना चाहिए कि आपकी तारीफ किसी को चापलूसी या चमचागिरी न लगे, क्योंकि कुछ लोग किसी की तारीफ चापलूसी या चमचागिरी की नीयत से ही करते हैं, ताकि बाद में उससे अपना कोई काम निकाल सकें. ऐसे लोगों का स्वभाव बहुत जल्दी पहचान में आ जाता है.

इसलिए याद रखिए, तारीफ करना भी एक कला है.

तस्वीर - सप्तरंग स्टूडियो से, आर्टिस्ट -रश्मि पाठक

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