प्रत्यक्ष रूप ही व्यक्तित्व का प्रथम परिचय होता है

 

मिसेज़ मेहरा दिल की बड़ी अच्छी महिला है. समाज सेविका है. अपने घर के नौकरों तक का भी बड़ा ख्याल रखती है. मुहल्ले में किसी के घर कोई बीमार पड़ जाए, तो बगैर बोले उसकी तीमारदारी करने को तैयार हो जाती हैं. किसी को कोई ऐसी जगह जाना है, जहाँ बच्चो को ले जाना उचित नहीं और घर में बच्चो को अकेला छोड़कर जाना खतरे से खाली नहीं, तो उनके बच्चो को बड़े प्यार से अपने घर में रख लेती हैं, यानि की मुहल्ले के लोगों से जब कोई मिसेज़ मेहरा का परिचय मांगता है, तो लोग कहते हैं,

अजी! मिसेज़ मेहरा का क्या परिचय दें? वे तो बड़ी अच्छी महिला हैं. काफी भावुक व दयालु हैं. मगर एक ही कमी है उनमे, उनकी जुबान कैंची की तरह चलती है. दिल की जितनी साफ़ है, जुबान की उतनी ही कड़वी है. किसी को अच्छी बात के लिए भी डांटती है, तो ऐसा लगता है की उसकी जान ही ले लेंगी. मूड बिगड़ जाये तो बातचीत में गालियों का भी प्रयोग कर बैठती हैं.

ख़ैर, ये तो हुई मिसेज़ महरा की बात. अब चलिये, मैं आपको क्लास वन अफसर वर्मा जी के बारे में कुछ बताती हूँ. वर्मा जी प्रोफेशन से एक बहुत बड़ी कम्पनी में उच्च अधिकारी हैं. पर जब तक वे अपना परिचय अपने प्रोफेशन के साथ किसी को न दें, तब तक लोग उन्हें कोई छोटे – मोटे ओहदे पर काम करने वाला ही समझते हैं, क्यूंकि उनका रहन – सहन ही कुछ ऐसा है. गंदे शर्ट व पतलून, बिखरे हुए बाल तथा घिसे हुए जूते- चप्पल उनके अच्छे-खासे व्यक्तित्व को मटियामेट कर देते हैं.

जैन साहब प्रोफेशन से इंग्लैंड रिटर्न डॉक्टर हैं, पर सिगरेट इतना अधिक पीते हैं की उनके पास आने-जाने वाले पेशेंट्स उन्हें ‘चेन स्मोकर डॉक्टर’ कहते हैं. उनकी टेबल पर कीमती सिगरेट का डिब्बा हर समय पड़ा रहता है. एक सिगरेट हर समय उनके हाथों में होती है, जिसे बड़ी बेफिक्री के साथ पेशेंट्स के सामने कश लेकर धुआं उड़ाते हुए पीते रहते हैं. कुछ लोग तो उनके बारे में यह भी कहते है की यह डॉक्टर दूसरों को क्या समझाएगा कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होता है. यह तो खुद ही चेन स्मोकर है.

सुधा जी डबल एम.ए. तथा पी.एच.डी. की हुई है और एक सरकारी कॉलेज में अर्थशास्त्र की हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट हैं. मगर इतनी पढ़ी- लिखी होने के बावजूद भी अपनी ओछी हरकतों से बाज नहीं आती है. किसी पार्टी या शादी-ब्याह में जायेंगी तो कीमती आभूषणों से लदकर जायेंगी. बेहिचक किसी से भी अपनी साड़ी या गहने का दाम दोगुना- तिगुना बतायेंगी. अपनी लिपस्टिक व परफ्यूम को तो इम्पोर्टेड ही बतायेंगी. यही कारण है कि इतनी पढ़ी- लिखी होने के बावजूद भी वे किसी को भी अपने व्यक्तित्व से प्रभावित करने में असफल रहती है. पड़ोस के कई लोग उन्हें पीठ पीछे ‘मिसेज डीन्गु’ ( डींगे मरने वाली ) कहते हैं.

यहाँ पर मिसेज़ मेहरा, वर्मा जी , जैन साहब या सुधा जी के प्रोफेशन, आदत व स्वभाव का जिक्र करते हुए मैं सिर्फ़ यही कहना चाहती हूँ कि कोई भी व्यक्ति कितने ही ऊंचे ओहदे पर काम करता हो, पर उसका ओहदा या प्रोफेशन उसके व्यक्तित्व का प्रथम व पूर्ण परिचायक नहीं होता, क्यूंकि जब भी कोई व्यक्ति किसी से पहली बार मिलता है या कसी पार्टी या समारोह वगैरह में जाता है तो लोग यह नहीं जानते है कि फलां व्यक्ति कितना पढ़ा – लिखा है? अगर पहली बार किसी को आपका कुछ प्रभावित करता है या आपकी ओर आकृष्ट करता है तो वह है आपका रहन-सहन, मृदु स्वभाव तथा अच्छी आदतें. कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से आपके रहन- सहन, अच्छे स्वाभाव तथा अच्छी आदतों को देखकर स्वयं अनुमान लगाने लगता है कि आप जरूर पढ़े-लिखे होंगे. किसी अच्छे व संसकारी घर- परिवार से ताल्लुक रखते होंगे.

कहने का तात्पर्य यह है कि आपका प्रत्यक्ष रूप (अच्छा रहन–सहन, स्वाभाव व आदत) ही आपके व्यक्तित्व का प्रथम परिचय होता है. अगर आप डॉक्टर होकर पेशेंट्स से सामने सिगरेट पीते है तो शायद ही कोई पेशेंट यह विश्वास कर पाएगा कि आप सचमुच एक अच्छे व क़ाबिल डॉक्टर हैं, क्यूंकि पेशेंट भी आपके प्रत्यक्ष रूप को देखकर ही आपके अच्छे या ख़राब डॉक्टर होने अनुमान करेगा. वह इतना थोड़े ही सोचेगा कि आप सिगरेट पीते है तो क्या हुआ, आप इलाज जरूर अच्छा करते होंगे.

उसी प्रकार आप डबल एम.ए. हों या पी.एच.डी. हों, मगर आप किसी के सामने अनपढ़- गंवारो की तरह ओछी हरकतें करेंगी या गलियों का प्रयोग करेंगी या फिर अपना रहन-सहन ठीक नहीं रखेंगी तो कौन आपकी इज्ज़त करेगा, इसलिए आप प्रत्यक्ष रूप से अपने व्यक्तित्व को निखारने की कोशिश कीजिये, यह कभी मत भूलिए की अच्छे रहन-सहन, अच्छी आदतें व स्वभाव ही प्रत्यक्ष रूप से आपके व्यक्तित्व का प्रथम परिचय बनते हैं. कभी-कभी आपने देखा होगा कि कुछ व्यक्ति बहुत ही नीचे ओहदे पर काम करते हैं या बहुत कम पढ़े-लिखे होते हैं, किन्तु जहां कहीं भी जाते हैं, लोगों को अपने व्यक्तित्व से अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं.

ऐसे लोगों के बारे में अक्सर लोग यही कहते हैं कि क्या हुआ, जो कम पढा-लिखा है. कम-से-कम उसे सलीक़े से हँसना-बोलना तो आता है. रहन- सहन तो ठीक है. आदतें व स्वभाव तो अच्छा है. कम-से-कम लोगों की इज्ज़त करना तो जनता है यानि कि प्रत्यक्ष रूप से उसके व्यक्तित्व को देखकर लोग उसके ओहदे या कम पढ़े- लिखे होने की बात भी भूल जाते है.

इसलिए इसमें कोई दो मत वाली बात नहीं है कि हमारा प्रत्यक्ष रूप ही हमारे व्यक्तित्व का प्रथम परिचय होता है, इसलिए हमें प्रत्यक्ष रूप से अपने व्यक्तित्व को हमेशा निखारते और संवारते रहना  चाहिए.

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