लॉक डाउन के बाद बच्चों की पढ़ाई की स्थिति

कोरोना महामारी के कारण देश में लगे लम्बे समय के लॉक डाउन लगभग सभी बच्चों की पढाई पर बुरा असर पड़ा है. ऑनलाइन पढाई से बच्चे पढाई से जरुर जुड़े रहे किन्तु इसका कोई ख़ास लाभ उनके शैक्षणिक विकास पर नही पड़ा. ऑनलाइन पढाई के दौरान मोबाइल गेम ने भी बच्चों को अपने गिरफ्त में ले लिया. जिसके कारण माता-पिता की भी कठिनाइयाँ बढ़ी.अब जबकि सभी राज्यों में स्कूल लगभग खुल ही चुका है तो देखा जा रहा है कि बाहर के मौसम को सहन करने के हिसाब से अधिकांश बच्चों की इम्युनिटी पावर पहले की अपेक्षा घट चुकी है और साथ ही एकाग्र होकर याद करने और लिखने की क्षमता भी काफी हद तक पहले की तरह नहीं है. ऐसे में जरुरी है कि अभिभावक और टीचर्स कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखते हुए सभी आयु वर्ग के बच्चों को पुन: स्वास्थ्य  और पढाई के प्रति लगाव पैदा करें. 

(1)अभिभावक की आर्थिक स्थिति इस लॉक डाउन में इतनी खराब हो गयी है कि जो महिलाएं पहले घर पर रहकर बच्चों को समय देती थीं, वो भी अब छोटी -मोटी नौकरी अथवा रोजगार से जुड़कर घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में लग गयी हैं, जो कि आवश्यक भी है. फिर भी इस वक्त बहुत ही जरुरी है कि माता -पिता अपने आर्थिक संघर्ष के साथ -साथ बच्चों को भी समय दें. दिनभर वो भले ही व्यस्त रहें किन्तु रात को प्रतिदिन एक से दो घंटा बच्चों की पढाई चेक करने पर दें. उनसे खुलकर मन की बात करें. उनके मानसिक स्वास्थ्य को समझने का प्रयास करें. 

(2) अभिभावक होने के नाते आप भी टीवी और मोबाइल से दूर रहें. ये समय नाजुक है. अपना कीमती समय मोबाईल /टीवी के पीछे गंवाने से बेहतर होगा कि आप वही समय बच्चों के साथ बिताएं. अगर आप टीवी, मोबाईल से दूर रहेंगे तो बच्चों को भी इसे यूज करने से रोक पाएंगे. वरना बच्चा आपको पलट कर जवाब दे सकता है कि आप खुद तो मोबाईल पर दिन -रात रहते /रहती हैं और जब देखो तो हमे मना करते हैं. बच्चों को जीवन में कई अच्छी बातें सिखाने के लिए हमे पहले अपने व्यक्तित्व व् व्यवहार को आदर्शपूर्ण बनाना जरुरी होता है.

(3)लॉक डाउन में घर पर ही रहने के कारण किशोर वर्ग  के बच्चों ने सोशल नेटवर्क के जरिये कई मित्र बना लिए हैं और वास्तविक दुनियां के मित्रों से ही नहीं बल्कि नाते -रिश्तेदारों से भी दूर हो गये हैं. इसके लिए जरुरी है कि माता -पिता उन्हें पड़ोस के मित्र, स्कूल के मित्र और नाते -रिश्तेदारों का महत्व सिर्फ बताएं ही नहीं, बल्कि उन्हें आपस में मिलने -जुलने का मौका भी दें. 

(4) कई युवा होते हुए बच्चे पढाई करने के नाम पर हर समय घर पर भी लैपटॉप या मोबाईल से चिपके रहते हैं. फिजूल के शार्ट वीडियो बनाने में समय बर्बाद करने लगे हैं. उनकी इस आदत को छुडाना बहुत जरुरी है. लॉक डाउन में कई युवा होते बच्चे स्वभाव से हठी भी हो गये हैं. किन्तु उन्हें सुधारना आवश्यक है. इसके लिए आप उन्हें घर के कुछ कामों की जिम्मेदारी देना शुरू करें. जैसे कि साफ़ -सफाई, छोटे भाई बहनों को पढ़ाना, किचन में बर्तन धो देना, सब्जी काटना, रोटी बनाना आदि. घरेलू काम करने से बच्चे सही मायने में जिम्मेदार बनते हैं.  

(5) दूसरी तरफ टीचर्स को स्कूल में बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ कुछ सृजनात्मक कार्यों से जोड़ना है. स्कूल में छोटे -छोटे प्रतियोगिता का आयोजन करते रहना है. बच्चे अपने स्कूल के मित्र के साथ सकारात्मक विचारधारा के साथ जुड़ें और पहले की तरह घुले मिलें, इसके उन्हें बच्चों के बीच कुछ कार्य ग्रुप में बांटकर करना होगा. सकूल की लाइब्रेरी में हलकी फुल्की कहानी की किताबें अगर हो तो उसे किशोर आयु के बच्चों को नियमत: पढने के लिए अवश्य दें. जो स्टूडेंट्स बोर्ड के एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं , उनको एक्स्ट्रा क्लास देकर पढाई में सहयोग दें. घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाने की वजह से बोर्ड के कई बच्चे ट्यूशन नही ले पा रहें और उनके भीतर एग्जाम को लेकर काफी डर बैठ गया है. ऐसे में हर टीचर का कर्तव्य है कि वो स्टूडेंट्स का मनोबल बढ़ाएं और उन्हें एग्जाम की तैयारी में सहयोग करें.

अगर इस प्रकार की कुछ ख़ास बातों को अभिभावक और टीचर्स ध्यान में रखेंगे तो लॉक डाउन के बीच में बच्चों की पढ़ाई जो काफी हद तक खराब हो गयी , जरुर धीरे-धीरे ठीक हो जायेगी.

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