संदेश

अतीत से भविष्य तक के सफर में

चित्र
  आज आप मेरे इस लेख के शीर्षक को पढ़कर ये बिलकुल मत समझिएगा कि मैं आपको कोई आध्यात्मिक लेख पढने को कहने वाली हूँ, क्योंकि आज की तारीख में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो आध्यात्मिक विषय पर चिन्तन करना पसंद करते हैं. लेकिन इस सच को भी आप नही नकार सकते हैं कि आध्यात्म हमे जीवन में असली आनंद की ओर ले जाता है.  आज मैं इस लेख में एक ऐसे विषय पर चर्चा कर रही हूँ या फिर कह लीजिये कि अपनी बात रख रही हूँ, जो कहीं ना कहीं आम व्यक्ति के जीवन से गहराई तक  जुड़ा हुआ विषय है. जैसे ही वर्तमान में कोई दुःख आता है, मानव अपने अतीत के उस पल में चला जाता है जिस पल में उसे आज की ही तरह किसी बड़े दुःख का सामना करना पड़ा था. इसके ठीक विपरीत अगर वर्तमान में कोई ख़ुशी प्राप्त होती है तो मानव तुरंत भविष्य के उस पल में चला जाता है जिसे उसने अभी दूर -दूर तक देखा भी नही है. यानि की एक आम मनुष्य कहीं ना कहीं अतीत से भविष्य तक के सफर में यात्रा करता रहता है और बीच में जो वर्तमान पल है उसकी महता को समझ नही पाता है. जबकि उसे अच्छी तरह से पता है कि अतीत कभी लौट कर नही आता है और भविष्य किसी का क्या होगा, ये कोई दावा नही...

छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से भी आत्मविश्वास बढ़ता है

चित्र
मनीष ग्यारवीं कक्षा का छात्र है। काफी अच्छा है वह पढ़ने में। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटी-बड़ी प्रतियोगिताओं में भी बराबर हिस्सा लेता रहता है। चाहे वो प्रतियोगिता उसके स्कूल में हो या रेडियो, टीवी, या फिर पत्र-पत्रिकाओं में हो, वह ज्यादातर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है। स्कूल में होने वाले कविता या निबंध प्रतियोगिता में तो वो हमेशा ही हिस्सा लेता है। चित्रकला प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेता है। कई बार प्रथम पुरस्कार मिलता है तो कई बार तृतीय पुरस्कार भी नहीं मिल पाता है। मगर मनीष हौसला नहीं हारता। वो फिर से प्रयास करता है। टी.वी./ रेडियो आदि पर जितने भी इनामी प्रतियोगिता वगैरह होते हैं, उनमें भी वो बखूबी हिस्सा लेता है। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी नाना प्रकार की प्रतियोगिता संबंधी स्तम्भ प्रकाशित होते हैं, उनमें भी वह अवश्य हिस्सा लेता है। मनीष के माता-पिता का कहना है कि, मनीष सिर्फ इनाम पाने के लिए तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेता है, बल्कि अपनी योग्यता व काबिलियत को परखने के लिए भी हर प्रकार की प्रतियोगिता में भाग लेता है। इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से आत्मविश्वास...

रोक लो, रूठ कर उनको जाने न दो

चित्र
अक्सर यह देखने में आता है कि छोटी-सी बात पर भाई की भाई से या पति की पत्नी से बहस हो गयी और बढ़ते–बढ़ते बात इतनी बढ़ गयी कि बरसों के रिश्ते पलभर में टूट गए. अभी हाल ही की बात है. महेशजी की अपने बड़े भई से कुछ रुपयों के लेन-देन को लेकर बहस हो गई और बात इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों ने रिश्ता ही तोड़ लिया. हुआ यूँ कि महेशजी की अपनी अलमारी में दो हज़ार रूपये रखे हुए थे. एक दिन महेशजी घर में नहीं थे और उनके बड़े भाई रमाकांत जी को रुपयों की जरुरत आन पड़ी, तो उन्होंने अलमारी में से छोटे भई से बगैर पूछे रूपये ले लिए. रमाकांतजी ने छोटे भाई से बगैर पूछे रूपये क्या ले लिए, छोटे भाई ने तो उन्हें चोर कह दिया और दोनों भाइयों के बीच ऐसी लड़ाई हुई कि खून के रिश्ते पलभर में टूट गए. जैसे इन दिनों भाइयों के रिश्ते पलभर में छोटी-सी बात पर टूट गए, उसी प्रकार कई और रिश्ते भी हैं, जो कभी-कभी छोटी सी बात पर टूट जाते हैं. लेकिन सच तो यह है कि छोटी- छोटी कड़वी बातों से अगर रिश्ते टूट जाते हैं तो कभी–कभी छोटी-सी मीठी व प्यारी बातों से रिश्ते टूटते-टूटते बच भी जाते हैं या यूं कह लीजिए कि टूटे हुए रिश्ते फिर से जुड़ भी जाते हैं...

प्रत्यक्ष रूप ही व्यक्तित्व का प्रथम परिचय होता है

चित्र
  मिसेज़ मेहरा दिल की बड़ी अच्छी महिला है. समाज सेविका है. अपने घर के नौकरों तक का भी बड़ा ख्याल रखती है. मुहल्ले में किसी के घर कोई बीमार पड़ जाए, तो बगैर बोले उसकी तीमारदारी करने को तैयार हो जाती हैं. किसी को कोई ऐसी जगह जाना है, जहाँ बच्चो को ले जाना उचित नहीं और घर में बच्चो को अकेला छोड़कर जाना खतरे से खाली नहीं, तो उनके बच्चो को बड़े प्यार से अपने घर में रख लेती हैं, यानि की मुहल्ले के लोगों से जब कोई मिसेज़ मेहरा का परिचय मांगता है, तो लोग कहते हैं, अजी! मिसेज़ मेहरा का क्या परिचय दें? वे तो बड़ी अच्छी महिला हैं. काफी भावुक व दयालु हैं. मगर एक ही कमी है उनमे, उनकी जुबान कैंची की तरह चलती है. दिल की जितनी साफ़ है, जुबान की उतनी ही कड़वी है. किसी को अच्छी बात के लिए भी डांटती है, तो ऐसा लगता है की उसकी जान ही ले लेंगी. मूड बिगड़ जाये तो बातचीत में गालियों का भी प्रयोग कर बैठती हैं. ख़ैर, ये तो हुई मिसेज़ महरा की बात. अब चलिये, मैं आपको क्लास वन अफसर वर्मा जी के बारे में कुछ बताती हूँ. वर्मा जी प्रोफेशन से एक बहुत बड़ी कम्पनी में उच्च अधिकारी हैं. पर जब तक वे अपना परिचय अपने प्रोफेशन के साथ क...

तारीफ करना भी एक कला है

चित्र
पिछले महीने चित्रा जी चेन्नई घुमने के लिए गयीं, तो वहां से अपनी पड़ोसन मधु जी के लिए एक खुबसूरत सी साड़ी लेकर आईं. मधु जी को साड़ी तो जरूर पसंद आयी, किंतु जितने प्रेम से चित्रा जी मधु जी के लिए साड़ी लायी थीं, उतने उत्साह से मधु जी ने साड़ी की तारीफ नहीं की, जिसके कारण चित्रा जी का मन बुझ-सा गया. उस दिन सोनू बड़ी मेहनत से नदियों और पहाड़ों के चित्र बनाकर अपने मम्मी-पापा को दिखाने उनके कमरे में गया. मम्मी टीवी देखने में मस्त थीं, इसलिए वो सोनू को यह कहकर पापा के पास भेज दी  कि अभी अपने पापा को चित्र दिखाओ, मैं बाद में देख लूंगी. पापा भी सोनू के बनाये चित्र को यूं ही एक सरसरी निगाह से देखकर उसे दूसरे कमरे में पढ़ने के लिए भेज दिये. बेचारा सोनू उदास होकर पढ़ने बैठ गया और सोचने लगा कि चित्र बनाते वक्त मैं सोच रहा था, कि मम्मी-पापा चित्र देखकर कितने खुश होंगे और मेरी तारीफ करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नही हो पाया. देखा जाए तो चित्रा जी या सोनू की तरह कितने ही लोग होते हैं, जो किसी से अपनी तारीफ सुनने की उम्मीद करते हैं, ऐसी स्थिति अगर सामने वाला व्यक्ति उनकी तारीफ न करे तो जाहिर है, उनका मन उद...

बोर करने वालों से कैसे बचें?

चित्र
कल दोपहर में मैं अर्चना जी के यहां गई तो देखी कि जयपुर से उनकी चाची जी हुई है. चूंकि मैं अर्चना जी के यहां किसी काम से सिर्फ 10 मिनट के लिए गई थी किंतु उनकी चाची के बार-बार आग्रह करने पर मुझे पूरे 2 घंटे उनके घर पर बैठना पड़ा. अब मैं क्या बताऊं कि इन 2 घंटों में अर्चना जी की चाची ने मुझे जयपुर शहर की बेहिसाब तारीफ तथा अपने घर के फिजूल किस्से सुना- सुना कर किस तरह बोर किया? वैसे मैं करती भी क्या आखिर वह बुजुर्ग थी. मैं उनका अपमान तो कर नहीं सकती थी, इसलिए चुपचाप मन मारकर उनकी बोर बातें सुनती रही. वर्मा साहब की आदत भी कोई कम बुरी नहीं है. वह एक ही बात को इतनी बार बोलते हैं कि सुनने वाला बुरी तरह से बोर हो  जाता है. जैन साहब डॉक्टर हैं, उनकी आदत है कि वह जब किसी के घर जाते हैं या पार्टी में जाते हैं तो इधर-उधर की बातें करते- करते अस्पताल एवं पेशेंट की बात पर आ जाते हैं. खानपान व सेहत पर इतना ज्यादा लेक्चर देना शुरू कर देते हैं कि लोग उनकी बातों से बोर होने लगते हैं. शिखा जी को तो पड़ोस की महिलाएं बोर वूमेन तक की उपाधि दे चुकी है. जानते हैं क्यों सिर्फ इसलिए कि शिखा जी जब किसी से बात क...

बात सिर्फ सलीके की है

चित्र
    कल मैं अनीता के घर गई तो देखी कि अनीता किचन में सब्जी बना रही है. मुझे आया हुआ देखकर वो जल्दी से चूल्हे का आँच कम करके और हाथ धो कर मेरे पास आकर बैठ गई. उसके हाथ पानी से भीगे हुए थे, इसलिए मैंने उसे हाथ पोछ लेने को कहा. इस पर उसने तुरंत वहीं पास की खिड़की में लगे पर्दे में हाथ पोछ लिया और मुझसे बात करने लगी. लेकिन मुझे यह बड़ा अजीब सा लगा. ऐसे ही एक दिन अपने बगल के पड़ोसी का बेटा बिट्टू खेलकूद कर शाम को घर आया तो उसकी मम्मी ने उसे हाथ पाँव  धो लेने को कहा. बिट्टू हाथ- पाँव  धोकर बाथरूम से निकला और एक सरसरी निगाह से उसने इधर उधर तौलिया ढूंढा. तौलिया नहीं मिला तो खटिया पर रखे छोटी बहन के फ्रॉक से ही उसने हाथ- पाँव  पोछ लिया. पुष्पा जी अक्सर कहीं बाहर जाते वक्त रुमाल लेना भूल जाती है. ऐसी स्थिति में अगर बाहर किसी होटल में खाना पड़ जाता है तो खाने के बाद हाथ में उन्हें अपनी साड़ी के आंचल से ही पोछना पड़ता है. देखा जाए तो करीब-करीब हर घर में ऐसा ही होता है, यानि की घर का कोई न कोई सदस्य इस प्रकार की आदतों का शिकार होता है. हाथ पोछने के लिए अगर तौलिया नहीं मिलता है...