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प्रत्यक्ष रूप ही व्यक्तित्व का प्रथम परिचय होता है

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  मिसेज़ मेहरा दिल की बड़ी अच्छी महिला है. समाज सेविका है. अपने घर के नौकरों तक का भी बड़ा ख्याल रखती है. मुहल्ले में किसी के घर कोई बीमार पड़ जाए, तो बगैर बोले उसकी तीमारदारी करने को तैयार हो जाती हैं. किसी को कोई ऐसी जगह जाना है, जहाँ बच्चो को ले जाना उचित नहीं और घर में बच्चो को अकेला छोड़कर जाना खतरे से खाली नहीं, तो उनके बच्चो को बड़े प्यार से अपने घर में रख लेती हैं, यानि की मुहल्ले के लोगों से जब कोई मिसेज़ मेहरा का परिचय मांगता है, तो लोग कहते हैं, अजी! मिसेज़ मेहरा का क्या परिचय दें? वे तो बड़ी अच्छी महिला हैं. काफी भावुक व दयालु हैं. मगर एक ही कमी है उनमे, उनकी जुबान कैंची की तरह चलती है. दिल की जितनी साफ़ है, जुबान की उतनी ही कड़वी है. किसी को अच्छी बात के लिए भी डांटती है, तो ऐसा लगता है की उसकी जान ही ले लेंगी. मूड बिगड़ जाये तो बातचीत में गालियों का भी प्रयोग कर बैठती हैं. ख़ैर, ये तो हुई मिसेज़ महरा की बात. अब चलिये, मैं आपको क्लास वन अफसर वर्मा जी के बारे में कुछ बताती हूँ. वर्मा जी प्रोफेशन से एक बहुत बड़ी कम्पनी में उच्च अधिकारी हैं. पर जब तक वे अपना परिचय अपने प्रोफेशन के साथ क...

तारीफ करना भी एक कला है

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पिछले महीने चित्रा जी चेन्नई घुमने के लिए गयीं, तो वहां से अपनी पड़ोसन मधु जी के लिए एक खुबसूरत सी साड़ी लेकर आईं. मधु जी को साड़ी तो जरूर पसंद आयी, किंतु जितने प्रेम से चित्रा जी मधु जी के लिए साड़ी लायी थीं, उतने उत्साह से मधु जी ने साड़ी की तारीफ नहीं की, जिसके कारण चित्रा जी का मन बुझ-सा गया. उस दिन सोनू बड़ी मेहनत से नदियों और पहाड़ों के चित्र बनाकर अपने मम्मी-पापा को दिखाने उनके कमरे में गया. मम्मी टीवी देखने में मस्त थीं, इसलिए वो सोनू को यह कहकर पापा के पास भेज दी  कि अभी अपने पापा को चित्र दिखाओ, मैं बाद में देख लूंगी. पापा भी सोनू के बनाये चित्र को यूं ही एक सरसरी निगाह से देखकर उसे दूसरे कमरे में पढ़ने के लिए भेज दिये. बेचारा सोनू उदास होकर पढ़ने बैठ गया और सोचने लगा कि चित्र बनाते वक्त मैं सोच रहा था, कि मम्मी-पापा चित्र देखकर कितने खुश होंगे और मेरी तारीफ करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नही हो पाया. देखा जाए तो चित्रा जी या सोनू की तरह कितने ही लोग होते हैं, जो किसी से अपनी तारीफ सुनने की उम्मीद करते हैं, ऐसी स्थिति अगर सामने वाला व्यक्ति उनकी तारीफ न करे तो जाहिर है, उनका मन उद...

बोर करने वालों से कैसे बचें?

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कल दोपहर में मैं अर्चना जी के यहां गई तो देखी कि जयपुर से उनकी चाची जी हुई है. चूंकि मैं अर्चना जी के यहां किसी काम से सिर्फ 10 मिनट के लिए गई थी किंतु उनकी चाची के बार-बार आग्रह करने पर मुझे पूरे 2 घंटे उनके घर पर बैठना पड़ा. अब मैं क्या बताऊं कि इन 2 घंटों में अर्चना जी की चाची ने मुझे जयपुर शहर की बेहिसाब तारीफ तथा अपने घर के फिजूल किस्से सुना- सुना कर किस तरह बोर किया? वैसे मैं करती भी क्या आखिर वह बुजुर्ग थी. मैं उनका अपमान तो कर नहीं सकती थी, इसलिए चुपचाप मन मारकर उनकी बोर बातें सुनती रही. वर्मा साहब की आदत भी कोई कम बुरी नहीं है. वह एक ही बात को इतनी बार बोलते हैं कि सुनने वाला बुरी तरह से बोर हो  जाता है. जैन साहब डॉक्टर हैं, उनकी आदत है कि वह जब किसी के घर जाते हैं या पार्टी में जाते हैं तो इधर-उधर की बातें करते- करते अस्पताल एवं पेशेंट की बात पर आ जाते हैं. खानपान व सेहत पर इतना ज्यादा लेक्चर देना शुरू कर देते हैं कि लोग उनकी बातों से बोर होने लगते हैं. शिखा जी को तो पड़ोस की महिलाएं बोर वूमेन तक की उपाधि दे चुकी है. जानते हैं क्यों सिर्फ इसलिए कि शिखा जी जब किसी से बात क...

बात सिर्फ सलीके की है

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    कल मैं अनीता के घर गई तो देखी कि अनीता किचन में सब्जी बना रही है. मुझे आया हुआ देखकर वो जल्दी से चूल्हे का आँच कम करके और हाथ धो कर मेरे पास आकर बैठ गई. उसके हाथ पानी से भीगे हुए थे, इसलिए मैंने उसे हाथ पोछ लेने को कहा. इस पर उसने तुरंत वहीं पास की खिड़की में लगे पर्दे में हाथ पोछ लिया और मुझसे बात करने लगी. लेकिन मुझे यह बड़ा अजीब सा लगा. ऐसे ही एक दिन अपने बगल के पड़ोसी का बेटा बिट्टू खेलकूद कर शाम को घर आया तो उसकी मम्मी ने उसे हाथ पाँव  धो लेने को कहा. बिट्टू हाथ- पाँव  धोकर बाथरूम से निकला और एक सरसरी निगाह से उसने इधर उधर तौलिया ढूंढा. तौलिया नहीं मिला तो खटिया पर रखे छोटी बहन के फ्रॉक से ही उसने हाथ- पाँव  पोछ लिया. पुष्पा जी अक्सर कहीं बाहर जाते वक्त रुमाल लेना भूल जाती है. ऐसी स्थिति में अगर बाहर किसी होटल में खाना पड़ जाता है तो खाने के बाद हाथ में उन्हें अपनी साड़ी के आंचल से ही पोछना पड़ता है. देखा जाए तो करीब-करीब हर घर में ऐसा ही होता है, यानि की घर का कोई न कोई सदस्य इस प्रकार की आदतों का शिकार होता है. हाथ पोछने के लिए अगर तौलिया नहीं मिलता है...

संकोच त्याग कर पहल करना सीखिए

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 कल मिसेज शर्मा जब बाजार से पांच मीटर कपड़ा खरीद कर लायीं, तो घर में नापने पर वह कपड़ा चार मीटर सत्तर सेंटीमीटर ही निकला. दुकानदार की इस धोखेबाजी पर मिसेज शर्मा को बहुत गुस्सा आया. वे कई बार सोचीं की दुकानदार से जाकर इस बात की शिकायत करें, किंतु झिझक व संकोच के कारण  कि कहीं दुकानदार ही उन्हें कुछ उल्टा- सीधा न कह दे, इसलिए वो दुकानदार के पास गयी ही नहीं यानि की मिसेज शर्मा अपने संकोची स्वभाव के कारण दुकानदार से शिकायत नहीं कर पायीं. देखा जाए तो मिसेज शर्मा की तरह कितने ही लोग अपने संकोची स्वभाव के कारण अपना छोटा- मोटा नुकसान तो क्या कभी-कभी बड़ा नुकसान भी कर बैठते हैं. कुछ लोग तो इतने संकोची होते हैं कि डॉक्टर से अपनी कुछ ख़ास बीमारियों को भी बताने से झिझकते है, कई लोग कोई नया काम धंधा शुरु तो करना चाहते हैं, किंतु संकोची मन में कई प्रकार के विचार उठने लगते हैं. कभी लगता है कि समाज क्या कहेगा? कहीं लोग मेरा मजाक तो नहीं उड़ाएंगे? इसी झिझक व संकोची स्वभाव के कारण वे कोई भी काम- धंधा ठीक से शुरू नहीं कर पाते हैं. ऐसी स्थिति में वह मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं, जिसका प्रभाव उनक...

बच्चों को अनुशासित करने के 18 सूत्र

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माना कि आज का युग डिजीटल युग है और बच्चों के समुचित विकास तथा उज्जवल भविष्य के लिए जरुरी है कि बच्चे डिजीटल वर्ल्ड को विस्तार से समझें, ताकि ज़माने के साथ चलना आसान बना रहे. किन्तु माता-पिता को मुख्य रूप से यह समझना बहुत जरुरी है कि इस डिजीटल वर्ल्ड में भी सफलता प्राप्त करने के लिए बच्चों को अनुशासन की शिक्षा स्नेह, प्रेम और सुरक्षा के साथ देते रहना बहुत जरूरी है। वैसे तो अनुशासन की शिक्षा सरल प्रतीत होती है। लेकिन बच्चों को अनुशासित करना कोई आसान काम नहीं है। अनुशासन की शिक्षा बच्चों को उचित तथा अनुकूल समय पर दी जाए तभी परिणाम स्थायी मिलता है। अनुशासनहीन बच्चे घर, परिवार, समाज- देश सभी के लिए बोझ बन जाते हैं। लेकिन आजकल उचित अनुशासन उसी को माना जाता है जो बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करते हुए समाजिक व्यवहार सिखाएं। अर्थात बच्चों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए माता-पिता या अभिभावक उसे प्रेम, सहानुभूति तथा स्नेह के सहारे धीरे-धीरे अनुशासन के मार्ग पर ले जाएँ. यदि आप भी अपने बच्चे को अनुशासित करना चाहते हैं अथवा उसके वर्तमान को सुदृढ़ कर उसके भविष्य को स्वर्णिम बनाना चाहते है, तो अनुशासन ...

पुस्तक प्रेमी हैं, तो जरुर बनाइए एक होम लाइब्रेरी

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आज के डिजीटल वर्ल्ड में ये बात सच है कि लोगों के बीच बुक्स का क्रेज धीरे –धीरे खत्म होता जा रहा है, किन्तु इसे पूरा सत्य मानना भी सही नही है, क्योंकि आज के डिजीटल युग में भी काफी बड़ी संख्या में ऐसे पुस्तक प्रेमी हैं, जो अपने पसंद के लेखकों की पुस्तके खरीदते भी हैं और उन्हें सहेज कर रखते भी हैं. आज का मेरा ये लेख ऐसे ही पुस्तक प्रेमियों के लिए है. लाइब्रेरी यानि की पुस्तकालय वो जगह है जहां विद्या व ज्ञान की देवी सरस्वती से हमारी साक्षात मुलाकात होती है. अब आप ही सोचिए कि जिस जगह पर हमारी मुलाकात ज्ञान की देवी से होती होगी वह जगह कितना पवित्र एवं अनमोल होगा. अगर आपको ज्ञान की देवी से मिलकर ज्ञान हासिल करने की इच्छा हो तो आप प्रतिदिन जरूर लाइब्रेरी जाइए. किंतु हो सकता है कि किसी कारणवश आप प्रतिदिन लाइब्रेरी जाने में स्वयं को असमर्थ पाते होंगे, यानि की हो सकता है कि लाइब्रेरी आपके घर से बहुत दूर हो  या फिर सदस्यता शुल्क बहुत ज्यादा हो. अपनी बढ़ती हुई आयु तथा स्वास्थ्य समस्या के कारण भी आप लाइब्रेरी नही जा पाते हों. कई बार ऐसा भी होता है कि आपकी पसंद की पुस्तकें लाइब्रेरी में बहुत कम हों...