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घर फूटे गंवार लूटे

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‘घर फूटे गंवार लूटे’ शायद ही कोई व्यक्ति हो जो इस कहावत से परिचित ना हो, लेकिन बड़े दुःख की बात है कि इस कहावत को जीवन में अधिकाँश लोग मानते नही हैं. हाल में ही मुझे अपनी एक परिचिता के यहाँ एक वाकया देखने को मिला. चार भाइयों का संयुक्त परिवार था और घर के मुखिया उनके पिताजी थे. चारो भाईयों का परिवार सुखी -सम्पन्न था और घर मिल- जुलकर अच्छा से चल रहा था. अचानक सासू माँ की तबियत ज्यादा ही बिगड़ गयी और उन्हें इलाज के लिए अकस्मात बेंगलोर ले जाना पड़ा. महीने भर के इलाज के बाद वो लगभग ठीक हो गई.  अब इन सबमे जो भी खर्च आया, उसे चारो भाइयों ने आपस में बाँट लिया. लेकिन कुछ ज्यादा आर्थिक भार तीसरे भाई किसलय पर आया , क्योंकि उस वक्त उसके पास बैंक में अतिरिक्त पैसे थे, जिसे वो खर्च कर सकता था.उसकी पत्नी को भी इससे कोई समस्या नही थी. लेकिन बात ही बात में एक दिन पत्नी के मुंह से जरा तीखे अंदाज में यह बात निकल गयी कि अगर हमलोग समय पर पूरा पैसा नही देते तो माँ की जान बचानी मुश्किल हो जाती. किसलय जी ने भी दो बातें पत्नी को आवेश में आकर सुना दिया और देखते -देखते बात इतनी बढ़ गयी कि घर का पूरा माहौल ही बिग...

वर्दी और सम्मान

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आज इस लेख को लिखने के पीछे मेरे साथ हाल ही में घटी एक घटना है. एक छोटे -से सामाजिक समारोह में मुझे सुनने को मिला कि चाहे कितनी भी समाज सेवा या देश सेवा कर लो, लेकिन सरकारी वर्दी में देश सेवा करने का जो आनन्द है, वो साधारण कपड़ों में नही है. कंधे पर लगा हुआ स्टार जब लोग देखते हैं और तारीफ़ करते हैं तो मत पूछ क्या मजा आता है. इसलिए यार मुझे तो हर हाल में प्रशासनिक सेवा में जाना है. आस -पास खड़े लोग उसकी बातों का समर्थन कर रहे थें और मैं एक कोने में खड़ी होकर यह सोचने लगी कि क्या इनकी सोच सही है? और अगर इनकी सोच सही है तो फिर जो लोग इस देश में साधारण कपड़ों में दिन -रात देश -समाज की सेवा में जुटे हुए हैं, क्या उनके कार्यों का कोई मोल नही?  आज की तारीख में अगर आप खुद से सर्वे करने में लग जायेंगे तो आपको बड़ी हैरानी होगी कि हमारे देश में हजारों -लाखों की संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनके पास खुद के जीने के लिए भी पर्याप्त पैसा नही है, मगर समाज हित के कार्यों में जी- जान से जुटे हुए हैं. कोई एक -दो हो तो मैं उनके नाम यहाँ पर लिख दूँ. मेरी नजर में तो ऐसे देश भक्त और समाजसेवी मेरी आँखों के सामने दिन...

बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं

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ये सिर्फ कहने की बात नही है कि बूढ़े और बच्चे एक समान होते हैं, बल्कि ये मानव जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई भी है. बुढ़ापा को मानव जीवन संध्या काल भी कहा  जाता है. यही वो वक्त है जब बुजुर्गों को अपने बसाए हुए परिवार यानि के अपने बच्चों के प्यार व् देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. अपने अनुभव के आधार पर मैं तो कहती हूँ कि इन्हें एक छोटे बच्चे जैसी केयर की जरूरत होती है बुढ़ापे में. लेकिन आज के डिजीटल वर्ल्ड में हमारा समाज आधुनिक नही अतिआधुनिकता की होड़ में अपने ही बच्चे के केयर के लिए समय नही निकाल पा रहा है तो बूढ़े माता -पिता के लिए समय कहाँ से लाएगा? बढती हुई महंगाई ने अधिकाँश घरों में पति -पत्नी दोनों को कमाने में व्यस्त कर दिया है, जिसका सीधा बुरा असर कई घर -परिवार में बच्चों और बूढों दोनों पर ही पड़ा है. फिर भी माता -पिता होने के कारण अपने बच्चों की जिन्दगी के लिए  पति -पत्नी एड़ी -छोटी एक कर देते हैं. लेकिन इन सबके बीच कहीं ना कहीं अपने बुजुर्ग माता -पिता की इच्छाओं अथवा आवश्यकताओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जिसका नकारात्मक प्रभाव बुजुर्ग माता -पिता पर यदि पड़ गया तो बेटे -बहु को भी ...

जो पास है वही ख़ास है

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पूरब अपने कमरे में कान में इयर फोन लगाकर मोबाइल पर व्यस्त था और बगल के कमरे से उसकी छोटी चाची उसे आवाज दे रही थी. दरअसल चाची कमरें में पलंग से टकराकर गिर गयी थीं और सर पे चोट लग गयी थी. वो मदद के लिए पूरब को आवाज देती रहीं और पूरब कान में इयर फोन लगाकर अपने जर्मनी वाले दोस्त से चैट करने में व्यस्त रहा. वो तो भला हो बिट्टू का, जो अपनी छोटी -सी गेंद को पलंग के नीचे खोजने आया तो अपनी मम्मी को गिरा देखकर भागकर पूरब के पास गया और उसे खींचकर दूसरे कमरे में लेकर आया. पूरब ने जल्दी से चाचो को सौरी कहते हुए उठाया और उनकी मलहम -पट्टी किया. बाद में जब बाकि लोग घर के आये तो सारी बात बिट्टू से जानने के बाद पूरब को अच्छी -खासी डांट लगायें.  सच पूछिए तो आज के डिजीटल वर्ल्ड में यह कोई आश्चर्य की बात नही है कि लोग पास के लोगों को नजरंदाज करने लगे हैं और इंटरनेट के माध्यम से मिलने वाले दूर के लोगों को पास समझने लगे हैं. मैं इस बात से हरगिज इंकार नही करती हूँ कि इंटरनेट ने कई बिछुड़े हुए लोगों को मिलाने में अहम भूमिका निभाई है. सोशल मीडिया पर कई अच्छे मित्र व् शुभचिंतक भी लोगों को मिले हैं. कई लोगों क...

अतीत से भविष्य तक के सफर में

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  आज आप मेरे इस लेख के शीर्षक को पढ़कर ये बिलकुल मत समझिएगा कि मैं आपको कोई आध्यात्मिक लेख पढने को कहने वाली हूँ, क्योंकि आज की तारीख में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो आध्यात्मिक विषय पर चिन्तन करना पसंद करते हैं. लेकिन इस सच को भी आप नही नकार सकते हैं कि आध्यात्म हमे जीवन में असली आनंद की ओर ले जाता है.  आज मैं इस लेख में एक ऐसे विषय पर चर्चा कर रही हूँ या फिर कह लीजिये कि अपनी बात रख रही हूँ, जो कहीं ना कहीं आम व्यक्ति के जीवन से गहराई तक  जुड़ा हुआ विषय है. जैसे ही वर्तमान में कोई दुःख आता है, मानव अपने अतीत के उस पल में चला जाता है जिस पल में उसे आज की ही तरह किसी बड़े दुःख का सामना करना पड़ा था. इसके ठीक विपरीत अगर वर्तमान में कोई ख़ुशी प्राप्त होती है तो मानव तुरंत भविष्य के उस पल में चला जाता है जिसे उसने अभी दूर -दूर तक देखा भी नही है. यानि की एक आम मनुष्य कहीं ना कहीं अतीत से भविष्य तक के सफर में यात्रा करता रहता है और बीच में जो वर्तमान पल है उसकी महता को समझ नही पाता है. जबकि उसे अच्छी तरह से पता है कि अतीत कभी लौट कर नही आता है और भविष्य किसी का क्या होगा, ये कोई दावा नही...

छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से भी आत्मविश्वास बढ़ता है

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मनीष ग्यारवीं कक्षा का छात्र है। काफी अच्छा है वह पढ़ने में। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटी-बड़ी प्रतियोगिताओं में भी बराबर हिस्सा लेता रहता है। चाहे वो प्रतियोगिता उसके स्कूल में हो या रेडियो, टीवी, या फिर पत्र-पत्रिकाओं में हो, वह ज्यादातर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है। स्कूल में होने वाले कविता या निबंध प्रतियोगिता में तो वो हमेशा ही हिस्सा लेता है। चित्रकला प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेता है। कई बार प्रथम पुरस्कार मिलता है तो कई बार तृतीय पुरस्कार भी नहीं मिल पाता है। मगर मनीष हौसला नहीं हारता। वो फिर से प्रयास करता है। टी.वी./ रेडियो आदि पर जितने भी इनामी प्रतियोगिता वगैरह होते हैं, उनमें भी वो बखूबी हिस्सा लेता है। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी नाना प्रकार की प्रतियोगिता संबंधी स्तम्भ प्रकाशित होते हैं, उनमें भी वह अवश्य हिस्सा लेता है। मनीष के माता-पिता का कहना है कि, मनीष सिर्फ इनाम पाने के लिए तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेता है, बल्कि अपनी योग्यता व काबिलियत को परखने के लिए भी हर प्रकार की प्रतियोगिता में भाग लेता है। इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से आत्मविश्वास...

रोक लो, रूठ कर उनको जाने न दो

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अक्सर यह देखने में आता है कि छोटी-सी बात पर भाई की भाई से या पति की पत्नी से बहस हो गयी और बढ़ते–बढ़ते बात इतनी बढ़ गयी कि बरसों के रिश्ते पलभर में टूट गए. अभी हाल ही की बात है. महेशजी की अपने बड़े भई से कुछ रुपयों के लेन-देन को लेकर बहस हो गई और बात इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों ने रिश्ता ही तोड़ लिया. हुआ यूँ कि महेशजी की अपनी अलमारी में दो हज़ार रूपये रखे हुए थे. एक दिन महेशजी घर में नहीं थे और उनके बड़े भाई रमाकांत जी को रुपयों की जरुरत आन पड़ी, तो उन्होंने अलमारी में से छोटे भई से बगैर पूछे रूपये ले लिए. रमाकांतजी ने छोटे भाई से बगैर पूछे रूपये क्या ले लिए, छोटे भाई ने तो उन्हें चोर कह दिया और दोनों भाइयों के बीच ऐसी लड़ाई हुई कि खून के रिश्ते पलभर में टूट गए. जैसे इन दिनों भाइयों के रिश्ते पलभर में छोटी-सी बात पर टूट गए, उसी प्रकार कई और रिश्ते भी हैं, जो कभी-कभी छोटी सी बात पर टूट जाते हैं. लेकिन सच तो यह है कि छोटी- छोटी कड़वी बातों से अगर रिश्ते टूट जाते हैं तो कभी–कभी छोटी-सी मीठी व प्यारी बातों से रिश्ते टूटते-टूटते बच भी जाते हैं या यूं कह लीजिए कि टूटे हुए रिश्ते फिर से जुड़ भी जाते हैं...