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क्या आपका बच्चा भी लिखने से जी चुराता है ?

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आज मैं इस लेख में बच्चों की पढ़ाई से सम्बंधित एक बड़ी समस्या का जिक्र कर रही हूँ. हो सकता है कि आपमें से कई माता -पिता का ध्यान अपने बच्चे की इस समस्या की ओर नही हो गया हो, किन्तु 24 साल से स्कूली शिक्षा से जुड़े होने के कारण मेरा अपना यह अनुभव रहा है कि आज के बच्चे लिखने से भागते हैं. इसके लिए अगर कोरोना काल में लगे लॉक डाउन को इसका कारण माना जाये तो मैं उससे भी पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ. दरअसल आधुनिक युग के बच्चे मोबाइल, लैपटॉप आदि से इतना ज्यादा जुड़ गये हैं कि उन्हें इन आधुनिक उपकरणों पर टाइप करना आसान लगता है और कॉपी पर लिखना कठिन काम लगता है.जबकि बच्चों के लिए लिखना कितना जरुरी है, ये कोई बताने वाली बात ही नही है. बार -बार किसी पाठ को पढ़ने और लिखने से ही बच्चों में पढाई के प्रति लगन जागती है और वो पढाई में मजबूत बनता है. लिखने की कला अथवा क्रिया से बच्चों को जोड़ने के लिए सबसे ज्यादा ध्यान स्कूल में टीचर को और घर पर माता -पिता को देना चाहिए. अगर आप एक ऐसे माता -पिता अथवा अभिभावक हैं जो ये मानते है कि किसी बड़े स्कूल में दाखिला करवा देने से या घर पर महंगे ट्यूटर रख देने से उनकी जिम्मेदा...

लॉक डाउन के बाद बच्चों की पढ़ाई की स्थिति

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कोरोना महामारी के कारण देश में लगे लम्बे समय के लॉक डाउन लगभग सभी बच्चों की पढाई पर बुरा असर पड़ा है. ऑनलाइन पढाई से बच्चे पढाई से जरुर जुड़े रहे किन्तु इसका कोई ख़ास लाभ उनके शैक्षणिक विकास पर नही पड़ा. ऑनलाइन पढाई के दौरान मोबाइल गेम ने भी बच्चों को अपने गिरफ्त में ले लिया. जिसके कारण माता-पिता की भी कठिनाइयाँ बढ़ी.अब जबकि सभी राज्यों में स्कूल लगभग खुल ही चुका है तो देखा जा रहा है कि बाहर के मौसम को सहन करने के हिसाब से अधिकांश बच्चों की इम्युनिटी पावर पहले की अपेक्षा घट चुकी है और साथ ही एकाग्र होकर याद करने और लिखने की क्षमता भी काफी हद तक पहले की तरह नहीं है. ऐसे में जरुरी है कि अभिभावक और टीचर्स कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखते हुए सभी आयु वर्ग के बच्चों को पुन: स्वास्थ्य  और पढाई के प्रति लगाव पैदा करें.  (1)अभिभावक की आर्थिक स्थिति इस लॉक डाउन में इतनी खराब हो गयी है कि जो महिलाएं पहले घर पर रहकर बच्चों को समय देती थीं, वो भी अब छोटी -मोटी नौकरी अथवा रोजगार से जुड़कर घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में लग गयी हैं, जो कि आवश्यक भी है. फिर भी इस वक्त बहुत ही जरुरी है कि माता -पिता अपन...

कहीं दूसरों के सामने आप भी अपने बच्चे के टेलेंट की नुमाइश तो नही कर रहे हैं ?

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अकसर कई घरों में  बचपन से लेकर आज तक मैं एक अजीब सी बात देखती आ रही हूं। हो सकता है मेरी तरह आपने भी देखा हो और इसे गलत भी समझा हो।  दरअसल ये बात है उन मासूम बच्चों की जिनके अंदर स्वाभाविक रूप से कोई खास बात होती है। मान लीजिए उसे अपनी आयु अथवा क्लास से ज्यादा कोर्स से बाहर की भी चीजें पढ़ने- लिखने आती हो, या फिर उसे गाना, डांस, कोई ख़ास गेम आम बच्चों से अधिक आता हो.  ऐसे में अकसर माता -पिता के मन में आता है कि समाज के चार लोग उसके बच्चे की उस खूबी की तारीफ़ करें. अब ऐसे में घर पर कोई मेहमान, परिचित ,रिश्तेदार अथवा अड़ोसी -पडोसी आ गये तो बात -बात में अपने बच्चे की कुछ तारीफ करेंगे. बच्चे को झट से कुछ ख़ास सुनाने को या पढने को कहेंगे. डांस करने को या गाने को कहेंगे. इतफाक से अगर बच्चे ने माता -पिता के मन के अनुरूप सुना दिया या दिखा दिया तब तो कोई बात नहीं. किन्तु अगर उनके मन के अनुरूप प्रदर्शन नही कर पायें तो खुद को शर्मिंदा होते हुए पाकर सीधा -सा आरोप मासूम बच्चे पर लगा देते हैं. मेहमान के जाने के बाद बच्चे को कसकर डांटना -पीटना अथवा कोसना भी शुरू कर देते हैं. पहले मुझे ऐसा ल...

सादा जीवन उच्च विचार, स्वस्थ तन -मन का है आधार

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एक बात हर बच्चे को बचपन से पाठ्यपुस्तक के माध्यम से या घर के बड़े-बुजुर्गों के द्वारा अवश्य पढाई जाती है – “सादा जीवन उच्च विचार”. किन्तु पता नही क्यों बच्चे जैसे –जैसे उम्र के अलग –अलग पड़ावों से गुजरते हुए जीवन में आगे बढ़ते जाते है, वैसे –वैसे ये उतम विचार ना जाने कहाँ खोते चले जाते हैं और फिर ये विचार किसी भी व्यक्ति को जीवन के उस मोड़ पर याद आता है, जब उसके जीवन में आर्थिक समस्या उत्पन्न होने लगती है. अब यहाँ पर सोचने वाली बात यह है कि अगर जीवन के शुरुआत से ही इस उतम कथन का पालन पूरा परिवार करे तो ख़ास उम्र में इसे अपनाने कि जरुरत ही नही पड़ेगी. क्योंकि जो लोग “सादा जीवन उच्च विचार” को अपने जीवन जीने का आधार बना लेते हैं, वो शुरू से ही अपने घर-परिवार, संस्था, नाते –रिश्तेदार, दोस्त –परिचित सभी को अपने विचार के अनुकूल पाने अथवा बनाने का प्रयास करते हैं. अगर कोई उनके विचार के अनुकूल नही होता है, तो ऐसे लोग चुपचाप उस व्यक्ति से किनारा कर लेते हैं या काम भर रिश्ता रखते हैं. चूँकि आज के डिजीटल युग में कोई व्यक्ति “सादा जीवन उच्च विचार” को अपनाना नही चाहता है. स्टेट्स शो करना एक बीमारी की तरह...

अति का कोई अंत नही होता

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क्या बात है यार ! कितना सुंदर तूने अपना मकान बनाया है. अरे वाह,  मैने जो आज तेरे ऑफिस का इंटीरियर डेकोरेशन  देखा तो सचमुच हैरान रह गया. आज से पहले इतने हाई स्टैण्डर्ड का इंटीरियर डेकोरेशन मैने नही देखा था. बड़ी किस्मत वाली हैं आप जो इतनी सुंदर बहु मिली है आपको. अरे ! आपका बेटा इंजीनियर बन गया , क्या बात है आपके तो अब भाग्य खुल गये , जमकर मांगिएगा दहेज में कैश. अरे भाई ! मैं किसी आम घरेलू पढ़ी -लिखी लड़की से शादी नही करने वाला हूँ. पूरे 7 साल कड़ी मेहनत किया है , तब जाके बैंक में अफसर बना हूँ और अब तो लड़की भी बस मुझे अपनी तरह अछे पद -प्रतिच्स्था वाली ही चाहिए. थोड़ी उम्र ज्यादा हो जाये तो हो जाये , कोई फर्क नही पडता. लेकिन बीबी तो नम्बर -1 चाहिए.  आपने भी अकसर इस तरह की बातें करने वाले को हमेशा ही किसी ना किसी रूप में अपने घर-परिवार दोस्त समाज आदि के बीच जरुर पाया होगा. दरअसल लोग चाहे कितनी भी प्रेरक कथाएँ  पढ़ लें , सुविचार लिख लें, सत्संग में बैठकर भजन -कीर्तन कर लें, यहाँ तक की किसी के निधन होने पर उसके अंतिम संस्कार में शामिल होकर नश्वर जीवन के रहस्य को समझ लें किन्तु क...

किसी की चुप्पी को उसकी कमजोरी मानने की भूल ना करें

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हमारे घर -परिवार से लेकर देश -समाज सभी जगह अधिकाँश लोग चुप रहने वालों को कमजोर समझते हैं या फिर बहुत चालाक समझते हैं. बहुत ही कम लोग आपको ऐसे मिलेंगे, जो चुप रहने वालों को समझदार होने का खिताब देंगे. लेकिन आज इस लेख के माध्यम से मैं आपको अवश्य यह बताने का पूर्ण प्रयास करूंगी कि चुप रहने को जरा सकारात्मक ढंग से देखें और इसपर गहन विचार करें तो इसके कई फायदे आपके व्यक्तित्व को दब्बू नही बल्कि समझदार बनाने में सहयोग करेंगे.  ये तो हम सभी जानते हैं कि मेडिटेशन अथवा ध्यान लगाने से मन शांत होता है और मानसिक तनाव भी घटता है. अगर धर्म और संस्कृति की बात करें तो वहां भी चित को शांत और मौन रहने को विशेष महत्व दिया गया है. इसी शांत रहने के स्वभाव को अकसर सामान्य भाषा में लोग चुप रहना कहते हैं. अगर ऐसे लोग किसी अपमान का सामना चुप रहकर कर लें तो इन्हें दब्बू का नाम दे दिया जाता है या फिर कमजोर मानकर उन्हें आगे भी लोग अपमानित करते हैं, जबकि अधिकाँश बार उनके चुप या मौन रहने के पीछे बड़ी समझदारी छुपी होती हैं. उनको मालूम होता है कि कब, कहाँ, कितना और किसके साथ क्या बोलना है? चुप रहने वाले लोगों के ब...

घर फूटे गंवार लूटे

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‘घर फूटे गंवार लूटे’ शायद ही कोई व्यक्ति हो जो इस कहावत से परिचित ना हो, लेकिन बड़े दुःख की बात है कि इस कहावत को जीवन में अधिकाँश लोग मानते नही हैं. हाल में ही मुझे अपनी एक परिचिता के यहाँ एक वाकया देखने को मिला. चार भाइयों का संयुक्त परिवार था और घर के मुखिया उनके पिताजी थे. चारो भाईयों का परिवार सुखी -सम्पन्न था और घर मिल- जुलकर अच्छा से चल रहा था. अचानक सासू माँ की तबियत ज्यादा ही बिगड़ गयी और उन्हें इलाज के लिए अकस्मात बेंगलोर ले जाना पड़ा. महीने भर के इलाज के बाद वो लगभग ठीक हो गई.  अब इन सबमे जो भी खर्च आया, उसे चारो भाइयों ने आपस में बाँट लिया. लेकिन कुछ ज्यादा आर्थिक भार तीसरे भाई किसलय पर आया , क्योंकि उस वक्त उसके पास बैंक में अतिरिक्त पैसे थे, जिसे वो खर्च कर सकता था.उसकी पत्नी को भी इससे कोई समस्या नही थी. लेकिन बात ही बात में एक दिन पत्नी के मुंह से जरा तीखे अंदाज में यह बात निकल गयी कि अगर हमलोग समय पर पूरा पैसा नही देते तो माँ की जान बचानी मुश्किल हो जाती. किसलय जी ने भी दो बातें पत्नी को आवेश में आकर सुना दिया और देखते -देखते बात इतनी बढ़ गयी कि घर का पूरा माहौल ही बिग...