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पढ़ें 8 अनिवार्य बातें, उपहार लेने- देने से पहले

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जमाना जरुर बदल गया है किन्तु आज भी त्योहारों, विवाहोत्सव या जन्मोत्सव के दिन आते ही हम अपने मित्रों और रिश्तेदारों के लिए उनकी पसंद का उपहार खरीदने में लग जाते हैं. हालाँकि यह परंपरा प्राचीन युग से चली आ रही है. जिस युग में भी यह परम्परा शुरू की गयी हो, इससे कोई फर्क नही पड़ता है, क्योंकि एक बात तो इस सत्य को जरुर दर्शाती है कि यह परम्परा बेहद कोमल भावना के साथ शुरू की गयी होगी. क्योंकि उपहार न केवल देने वाले की भावनाओं का प्रदर्शन करती है, बल्कि उपहार लेने वाले के उत्साह व् आनन्द को भी प्रदर्शित करती है. अत: आप जब भी किसी के लिए उपहार खरीदें तो इन 8 मुख्य बातों का ध्यान अवश्य रखा कीजिए- उपहार में छुपी है आपके इज्जत और प्रेम की अभिव्यक्ति-  (1) सर्वप्रथम तो उपहार देते समय आयु वर्ग का ख्याल रखना जरुरी है. अगर आप इसका ख्याल नही रखेंगे तो हो सकता है कि आपने जो चीज जिसके लिए दी, वो उसके आयु के हिसाब से सही नही है, तो उसे वह स्वयं इस्तेमाल नही करके किसी और को इस्तेमाल करने के लिए दे देगा. अगर कभी उसपर आपकी नजर पड़ गयी तो आपको भी मन से अच्छा नही लगेगा. (2) ख़ुशी के किसी भी अवसर (विवाहोत्सव,...

नारी स्वयं समझे अपने अस्तित्व का महत्व

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आज हमारे भारत देश को आजाद हुए 73 वर्ष हो चुके हैं. लेकिन एक सवाल आज भी काफी हद तक वहीँ के वहीँ है. क्या आज भी अधिकांश अबलाएँ ऐसी नहीं हैं, जो गुलामी की जंजीर से किसी न किसी रूप में बंधी हुई हैं. जिनकी आँखों के आँसू सुख चुके हैं. मस्तिष्क कुछ सोचने-समझने की क्षमता खो चुका है. मन की दो बातें सुनने वाला या दु:खी मन को दिलासा देने वाला भी नजरें चुराता है. अगर ये औरतें आज ऐसी मजबूर जिन्दगी जी रही है तो इसके लिए दोषी कौन है? समाज, परिवार या स्वयं औरत. मेरे ख्याल से तो इसके लिए पहले परिवार और समाज ही दोषी हैं और बाद में कुछ हद तक औरतें भी दोषी हैं.आज भी अशिक्षित ही नही कई बार शिक्षित परिवार में भी लड़की का जन्म हुआ नहीं कि लोग मन ही मन किस्मत को कोसने बैठ जातें हैं. निम्नवर्ग के परिवारों में तो प्राय: लोग खुलेआम ही लड़की को कोसते हैं, किन्तु मध्यम वर्गीय परिवार के लोग जरा दबी जबान में लड़कियों को कोंसते हैं और उच्चवर्गीय परिवार में अगर लड़की के जन्म पर अफ़सोस प्रकट न भी किया जाए तो भी उनके मन में पुत्र प्राप्ति की इच्छा बने ही रहती है. दुःख की बात तो यह है कि जो माँ उसे नौ महीने तक अपनी कोख में रख...

सोशल मीडिया और आप- 10 टिप्स

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  आज के डिजीटल वर्ल्ड में शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जो किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ न हो. चूँकि जमाना बदल रहा है और लगभग देश के हर कोने में सोशल नेटवर्क पहुँच चुका है, ये हम सभी जानते हैं. आज सेकंड भर में लोग देश- विदेश में रहने वाले लोगों से जुड़ जाते हैं. चाहे वो माध्यम फोन हो, व्हाट्सएप्प हो, फेसबुक हो या अन्य कोई भी सोशल नेटवर्क हो. इस बात से हरगिज इंकार नही किया जा सकता है कि सोशल मीडिया ने हमे नौकरी, बिजनेस, पढ़ाई आदि के क्षेत्रों में काफी सहयोग किया है. हमारे पास अगर समय की कमी है और कोई ख़ास न्यूज़ देखना है तो तुरंत अपने मोबाइल पर न्यूज़  चैनल खोलकर देख लेते हैं. आजकल लगभग सभी न्यूज़ चैनल वाले अपना फेसबुक एकाउंट अथवा पेज बनायें हुए हैं. कोई भी नया न्यूज़ आने पर सबसे पहले उसमे अपडेट करते है. जिसके कारण हम पल पल की खबरों से अवगत होते रहते हैं. सोशल मीडिया के कुछ ख़ास प्लेटफार्म ने हमे अपनों के करीब ला दिया है. जिनसे हमारा सालोंसाल मिल पाना कठिन है, उनसे हम जब चाहे तब मिल लेते हैं. हमारे कई भूले- बिछुड़े मित्र व नाते-रिश्तेदारों को भी इसने हमसे मिला क्या दिया है, ब...

'हाँ' कहिए मगर सोच - समझकर

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हमारे दैनिक जीवन में वह हर शब्द जो भी हमारे द्वारा कहा-सुना जाता है, वह कहने एवं सुनने में चाहे कितना भी छोटा हो, लेकिन होता काफी महत्वपूर्ण है. अत: हम जो कुछ भी कहें काफी सोच-समझ कर ही कहें. हमारे द्वारा कहा जाने वाला 'हाँ' या 'न' भी काफी छोटा सा शब्द होता है, लेकिन यह अपने- आप में काफी बड़े - बड़े मसले  समेटे हुए रहता है. इनके प्रयोग से हमे कहीं पर सुखानुभूति होती है, तो कहीं मन क्षुब्ध भी हो जाता है. देखा जाता है कि अकसर लोग आपसी संकोचवश अथवा अपनी लोकप्रियता को बचाने के कारण या दूसरों पर अहसान  लादने के लिए किसी भी कार्य के लिए बिना सोचे-समझे 'हाँ' तो कर देते हैं, किन्तु किसी भी कारणवश  उसे पूरा न कर पाने अथवा ठीक से पूरा कर पाने में असफल हो जाने पर आलोचनाओं के शिकार हो जाते हैं. यही उनके तनाव ग्रस्त होने का कारण भी बन जाता है. दूसरों की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हम दूसरों की हर उचित-अनुचित बात में  हामी भरकर अपने निश्चित कार्यक्रमों अथवा आवश्यक कामों को छोड़ अपनी सम्पूर्ण शक्ति एवं समय दूसरों के पीछे लगा दें. यदि किसी को वास्तव में सह...

किसी को खुश करने के चक्कर में किसी और को दुखी तो नहीं कर रहें हैं आप?

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  दिमाग पर जोर डालिए तथा ध्यान से सोचने की चेष्टा कीजिए कि कहीं आप किसी को खुश करने के चक्कर में किसी और को दुखी तो नहीं कर रहें हैं? दरअसल अक्सर ही ऐसा होता है कि किसी को खुश करने के चक्कर में हम लगातार किसी और को दुखी करते रहते हैं. इस बात से भी हम अनभिज्ञ रहते हैं कि किसी की भावना को अत्यधिक महत्व देते- देते हम किसी और की भावना को ठेस पहुँचा रहे हैं. मेरी एक परिचिता हैं, जिनका नाम अमिता है. अमिता जी के ही फ्लैट में मिसेज जोशी और चेतना जी भी रहती थीं. इन तीनों में अच्छी खासी दोस्ती थी. एक बार किसी बात पर अमिता और मिसेज जोशी में कहा-सुनी हो गयी. अब हुआ यह कि चेतना जी अकेले में तो अमिता से ठीक से बात करती थीं, मगर मिसेज जोशी के सामने बात करने में हिचकिचाती थीं. शायद चेतना जी मिसेज जोशी को खुश करना चाहती थीं, कि आपकी तरह मैं भी अमिता को बुरा समझती हूँ तथा उससे बात नही करना चाहती हूँ. जबकि सच्चाई तो यह है कि चेतना जी को अमिता से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं थी. वो सिर्फ मिसेज जोशी को खुश करने के लिए अमिता से बात नहीं करना चाहती थीं. चेतना जी के इस व्यवहार से अमिता को काफी दुःख होता...