नारी स्वयं समझे अपने अस्तित्व का महत्व
आज हमारे भारत देश को आजाद हुए 73 वर्ष हो चुके हैं. लेकिन एक सवाल आज भी काफी हद तक वहीँ के वहीँ है. क्या आज भी अधिकांश अबलाएँ ऐसी नहीं हैं, जो गुलामी की जंजीर से किसी न किसी रूप में बंधी हुई हैं. जिनकी आँखों के आँसू सुख चुके हैं. मस्तिष्क कुछ सोचने-समझने की क्षमता खो चुका है. मन की दो बातें सुनने वाला या दु:खी मन को दिलासा देने वाला भी नजरें चुराता है. अगर ये औरतें आज ऐसी मजबूर जिन्दगी जी रही है तो इसके लिए दोषी कौन है? समाज, परिवार या स्वयं औरत. मेरे ख्याल से तो इसके लिए पहले परिवार और समाज ही दोषी हैं और बाद में कुछ हद तक औरतें भी दोषी हैं.आज भी अशिक्षित ही नही कई बार शिक्षित परिवार में भी लड़की का जन्म हुआ नहीं कि लोग मन ही मन किस्मत को कोसने बैठ जातें हैं. निम्नवर्ग के परिवारों में तो प्राय: लोग खुलेआम ही लड़की को कोसते हैं, किन्तु मध्यम वर्गीय परिवार के लोग जरा दबी जबान में लड़कियों को कोंसते हैं और उच्चवर्गीय परिवार में अगर लड़की के जन्म पर अफ़सोस प्रकट न भी किया जाए तो भी उनके मन में पुत्र प्राप्ति की इच्छा बने ही रहती है. दुःख की बात तो यह है कि जो माँ उसे नौ महीने तक अपनी कोख में रखकर जन्म लेती है, वो भी उसके जन्म पर दिल से ख़ुशी जाहिर नहीं कर पाती है. आखिर लड़के और लड़कियों में यह भेद क्योँ किया जाता है. सिर्फ इसलिए कि लड़कों की तरह लडकियाँ माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा नही बन सकती हैं. या इसलिए कि लड़कियों को दहेज देकर शादी करनी पड़ती है.
एक तरफ स्त्रियों के संबंध में मनुस्मृति में कहा गया है कि बचपन में स्त्रियों को पिता की अधीनता में युवावस्था में पति की अधीनता में तथा बुढ़ापे में अगर विधवा हो गयी तो पुत्र की अधीनता में रहना चाहिए तो दूसरी तरफ प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तु ने स्त्रियों को पुरुषों से हीन बताया है. इनके कथनों से तो यही साबित होता है कि हर तरफ से स्त्री को पुरुष की गुलामी करनी चाहिए क्योँकि वो पुरुषों से हीन हैं. ये सवाल तो बार-बार उठाया जाता रहा है कि क्योँ स्त्री पुरुष से हीन बनकर रहे? क्योँ वो अपने उपर होने वाले अत्याचार व् शोषण का विरोध न करे. किन्तु इस सवाल का जवाब आज तक सही ढंग से ठोस रूप में कोई नहीं दे पाया.
अगर देखा जाए तो स्त्री के बिना पुरुष का कोई अस्तित्व नहीं है. एक के बिना दूसरे की कल्पना करना असम्भव है. मगर फिर भी स्त्री को पुरुष के मुकाबले तुच्छ ही समझा जाता है. उसकी उपलब्धियों को शुरू से ही नकारा जाता रहा है. अगर बेटा पढाई में कमजोर भी है तो उसके पीछे माता-पिता तब भी पैसा फेंकते हैं कि किसी भी प्रकार वो पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन जाए. वहीँ दूसरी ओर अगर बेटी पढाई में तेज है या फिर किसी दूसरी कला में भी निपूर्ण है तो उसे माता-पिता की ओर से आगे बढ़ने का प्रोत्साहन शायद ही मिल पाता है. ख़ास कर मध्यमवर्गीय परिवारों में तो लड़कियों को आगे बढ़ने का मौका बड़ी ही मुश्किल से मिल पाता है. लड़कियों पर शुरू से ही कई प्रकार की पाबंदियाँ लगा दी जाती है. कदम-कदम पर उसे लड़की होने का अहसास कराया जाता है. तुम ये काम नहीं कर सकती. तुम वहां अकेले नहीं जा सकती. तुम लड़की हो, तुममें सहनशक्ति होनी चाहिए. तुम्हें बड़ों के सामने इस तरह से हँसना नहीं चाहिए. लड़कियों को कदम-कदम पर इस तरह से लड़की होने का अहसास कराया जाता है कि युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते उसके स्वभाव में दब्बूपन आ जाता है. जब ये लड़कियाँ विवाह के बाद ससुराल जाती हैं तो कभी-कभी दुर्भाग्यवश उसे वहां भी ससुराल वालों के व्यवहार के कारण भी दब्बू बन जाना पड़ता है. अपने दब्बूपन के कारण कम आयु में ही वो अधेड़ दिखने लगती है. सास-नन्द के ताने और पति की प्रताडना से वो अन्दर-अन्दर टूटती रहती है. आज भी हमारे देश में कई जगहों पर माता-पिता द्वारा दान-दहेज़ की मांगों को पूरी न कर पाने की स्थिति में लड़की को ससुराल में शारीरिक तथा मानसिक रूप से यातना दिया जाता है. ऐसी स्थिति में कई लडकियाँ या तो इज्जत की खातिर सब कुछ सहती रहती हैं या तो ससुराल वालों की यातताओं से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या का रास्ता अपना लेती हैं.
मैं इस बात का पहले भी उल्लेख कर चुकी हूँ कि नारी की जो दयनीय स्थिति है उसके लिए परिवार और समाज तो दोषी है ही, साथ ही नारी भी बहुत हद तक दोषी है. परिवार और समाज किस प्रकार दोषी है यह तो हम देख चुके हैं. आइए अब देखें कि स्वयं स्त्री भी अपनी इस स्थिति के लिए किस प्रकार दोषी है? ये तो हम सभी जानते हैं कि निरक्षता महिलाओं के आधे से ज्यादा अधिकार छीन लेती है. आज हमारे देश में शिक्षा के महत्व को विशेषकर महिला साक्षरता के महत्त्व को सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाएं तरह-तरह के कार्यक्रमों द्वारा निरंतर समझाने का प्रयास कर रही है. टी.वी., रेडियो, अखबार, इंटरनेट आदि के माध्यमों से भी बराबर साक्षरता के महत्त्व को समझाया जा रहा है. किन्तु अभी भी कई जगहों पर सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के प्रयास के बाद भी स्त्री शिक्षा में कुछ ख़ास प्रगति नही हो पायी है. ये पढाई को एक बोझ समझती है. आज भी गौर से देखिए तो कई लड़कियाँ सिर्फ माता-पिता की डर से पढाई करती है. या सिर्फ ये समझकर पढाई करती है कि अगर वो आई.ए, बी.ए पास नहीं की रहेंगी तो उन्हें योग्यवर नहीं मिल पाएगा. इसलिए वो जैसे-तैसे आई.ए, बी.ए. पास कर लेना चाहती है ताकि उन्हें योग्यवर मिल सकें. आज के डिजीटल युग में तो कई चीजों की पढाई मान्यता प्राप्त विश्वविधालयों में ऑनलाइन भी हो रही है. किन्तु फिर भी अधिकांश लड़कियाँ पढाई के प्रति उदासीन ही देखी जाती है. कई जगह तो माता-पिता लड़कियों को बेटे की तरह पढ़ाना-लिखाना भी चाहते हैं तो खुद लड़कियाँ पढाई-लिखाई पर ध्यान नही देती है. कई बार यह भी देखा जाता है कि अगर कुछ लड़कियों को कुछ बनने का मौका परिवार की ओर से दिया जाता है तो वो इस मौके का फायदा उठाने लगती हैं. घर से निकलती हैं कॉलेज जाने के लिए और रास्ते से ही दोस्तों के साथ होटल, पिक्चर या पार्क में मस्ती करने चल देती हैं. कई लड़कियां तो फीस के पैसे तथा जेब खर्च के पैसे से नशीली चीजों का सेवन भी करने लगती है. मोबाइल पर अश्लील वीडियोज देखने में समय व्यतीत करती हैं या पुरुष मित्र से चैट करने में अपना कीमती समय खर्च करती हैं. बेटी की असलियत जब तक माता-पिता को पता चलता है, तब तक बात बिगड़ चुकी होती है. माता-पिता को अफ़सोस प्रकट करते हुए मन मसोसकर कहना पड़ता है कि हमने बेटी को इतनी आजादी देकर जिन्दगी की सबसे बड़ी भूल की है.
महिला उत्पीड़न के प्रमुख कारणों में से एक कारण है औरत होकर औरत का दुश्मन होना. जब लड़की विवाह के बाद ससुराल जाती है तो उसकी आँखों में घर-गृहस्थी बसाने के कितने ही सपने बसे होते हैं. मगर वो सपने जल्द्दी ही टूट जाते हैं. सास-ननद बहु की दुश्मन बन जाती है. बहु पर अत्याचार करने के समय साथ यह नहीं सोचती है कि वो भी कभी बहु थी. या ननद यह नहीं सोचती है वो भी कभी किसी के घर की बहु बनेगी. कई बार बहुएँ भी स्त्री होते हुए भी अपनी सास- ननद या देवरानी पर हुकुमत करने लगती हैं. ससुराल में कदम रखते ही वो इस प्रयास में लग जाती हैं कि किसी प्रकार सास-ननद से पीछा छुटे. संयुक्त परिवार में दीवार खड़ा कर देती हैं. अगर पति अच्छी नौकरी करता है तो वो अपना एकल परिवार बसाने का प्रयास करने लगती है. यानि की किसी न किसी रूप में हम कह सकते हैं कि आज भी काफी हद तक महिला की दुश्मन महिला ही होती है. सोशल नेटवर्क पर चाहे कितने भी प्रेम पूर्ण तस्वीरें डाल दें दुनिया को दिखाने के लिए, लेकिन मन से ईर्ष्या का भाव दूर नही कर पाती हैं.
इस प्रकार से महिला उत्पीड़न के प्रमुख कारणों पर अगर हम गहराई से विचार करेंगे तो पाएंगे कि आज भी अधिकांश महिलाओं की स्थिति अगर दयनीय बनी हुई है तो इसके लिए परिवार और समाज के साथ-साथ बहुत हद तक महिलाएँ स्वयं भी दोषी है. परिवार और समाज अपना नजरिया स्त्री के प्रति बदले, इसके पहले जरुरी है कि स्वयं स्त्री अपने अस्तित्व के महत्त्व को समझने की कोशिश करें. स्त्री अपने अधिकारों के प्रति स्वयं सजग हो. अपने उपर होने वाले अन्याय के खिलाफ स्वयं आवाज उठाने के लायक तन-मन से मजबूत बने.
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तस्वीर - सप्तरंग स्टूडियो से (चित्रकार - रश्मि पाठक )

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