किसी को खुश करने के चक्कर में किसी और को दुखी तो नहीं कर रहें हैं आप?
दिमाग पर जोर डालिए तथा ध्यान से सोचने की चेष्टा कीजिए कि कहीं आप किसी को खुश करने के चक्कर में किसी और को दुखी तो नहीं कर रहें हैं?
दरअसल अक्सर ही ऐसा होता है कि किसी को खुश करने के चक्कर में हम लगातार किसी और को दुखी करते रहते हैं. इस बात से भी हम अनभिज्ञ रहते हैं कि किसी की भावना को अत्यधिक महत्व देते- देते हम किसी और की भावना को ठेस पहुँचा रहे हैं.
मेरी एक परिचिता हैं, जिनका नाम अमिता है. अमिता जी के ही फ्लैट में मिसेज जोशी और चेतना जी भी रहती थीं. इन तीनों में अच्छी खासी दोस्ती थी. एक बार किसी बात पर अमिता और मिसेज जोशी में कहा-सुनी हो गयी. अब हुआ यह कि चेतना जी अकेले में तो अमिता से ठीक से बात करती थीं, मगर मिसेज जोशी के सामने बात करने में हिचकिचाती थीं. शायद चेतना जी मिसेज जोशी को खुश करना चाहती थीं, कि आपकी तरह मैं भी अमिता को बुरा समझती हूँ तथा उससे बात नही करना चाहती हूँ. जबकि सच्चाई तो यह है कि चेतना जी को अमिता से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं थी. वो सिर्फ मिसेज जोशी को खुश करने के लिए अमिता से बात नहीं करना चाहती थीं. चेतना जी के इस व्यवहार से अमिता को काफी दुःख होता. उसे ऐसा लगता था कि चेतना जी जान भूझकर उसका अपमान कर रही है. धीरे-धीरे अमिता भी चेतना जी से बात करना बंद कर दी. अब आप ही बताइए क्या यह ठीक है कि किसी को खुश करने के लिए किसी और को हम अपमानित करें?
एक बार अनुपा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. अनुपा को अपनी छोटी ननद रितु से बड़ा स्नेह था. छोटी बहन की तरह प्यार करती थी उससे. रितु को भी अपनी बड़ी भाभी से बड़ा स्नेह था. पर जब अनुपा के देवर की शादी हुयी और देवरानी घर आयी तो जेठानी और देवरानी के बीच बात-बात पर कहा-सुनी होने लगी. छोटी भाभी नयी-नयी आयी थी तथा बड़ी भाभी की अपेक्षा ज्यादा सुंदर, पढ़ी-लिखी तथा ज्यादा अमीर घराने की भी थी, इसलिए रितु छोटी भाभी की ओर कुछ ज्यादा ही आकर्षित हो गयी. छोटी भाभी को खुश करने के चक्कर में उनकी हर गलत-सही बात में हाँ में हाँ मिलाने लगी. एक दिन छोटी भाभी किसी बात पर जेठानी को बददिमाग बोली तो रितु भी उनकी हाँ में हाँ मिला दी. किसी प्रकार यह बात अनुपा के कान में पड़ गयी. उस दिन उसे इस बात का काफी दुःख हुआ कि जिस ननद को वह सगी बहन की तरह प्यार करती थी, वह भी मुझे बददिमाग कहती है. आज अनुपा का अपनी ननद रितु से रिश्ता तो नहीं टूटा है, मगर अब उनके रिश्ते में स्नेह नहीं सिर्फ औपचरिकता है. कई बार तो ऐसा भी होता है कि दोस्ती या रिश्तेदारी निभाने के चक्कर में लोग किसी को खुश करते-करते अपना ही नुक्सान कर बैठते हैं. अखिल अपने चचेरे बड़े भाई संजीव की काफी इज्जत किया करता था. अखिल अपने माता-पिता से ज्यादा संजीव को अपना हितैषी मानता था. किसी भी महत्त्वपूर्ण बात में जब तक अखिल संजीव की राय नहीं ले लेता तब तक उसके मन को शान्ति नहीं मिलती थी. बी.कॉम. की पढाई खत्म करने के बाद अखिल को एक अच्छी कम्पनी में 12 हजार की नौकरी मिली. अखिल नौकरी करना चाहता था, मगर संजीव ने उससे कह दिया कि बारह हजार की नौकरी में क्या रखा है. इस नौकरी को गोली मारो और इससे अच्छी नौकरी खोजने की कोशिश करो. अखिल को न चाहते हुई भी सिर्फ संजीव को खुश करने के लिए हाथ में आयी हुयी नौकरी छोडनी पड़ी. अब हाल यह है कि अखिल पिछले ढाई साल से अच्छी नौकरी ढूढ़ रहा है, पर नौकरी नहीं मिल रही है.
अशोक साहब की उलझन भी अजीब है. जब पत्नी को खुश रखने की कोशिश करते हैं तो माँ नाराज हो जाती है और अगर माँ को खुश करना चाहते हैं कि तो पत्नी स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगती है. कई बार तो माता-पिता अपने बच्चे को खुश करने के चक्कर में उन्हें जिद्दी व् लोभी बना देते हैं. अगर बच्चा गिर गया और चोट लग जाने के कारण रोने लगा या खाने-पीने में आना-कानी कर रह है, तो माता-पिता उसे मनाने के लिए या खुश करने के लिए कहते हैं कि हम तुम्हें ये खरीद देंगें वो खरीद देंगें. ऐसा करने से बच्चे प्राय: जिद्दी अथवा लोभी बन जाते हैं. अगर हम चाहते हैं कि किसी खुश करने के चक्कर में हम किसी और की भवनाओं को ठेस न पहुंचाए या हमारा अपना कोई नुक्सान न हो या हमारे बच्चे जिद्दी व् लोभी न बने और हमारे घर की शांति भंग न हो, तो हमें रिश्ते एवं दोस्ती में प्यार, मुहब्बत आदि का संतुलन बनाकर रखना होगा. अगर हमारी सहेली का किसी से मन-मुटाव होता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसे खुश करने के लिए हम भी उससे बात नहीं करें, जिससे हमारी सहेली का मन-मुटाव हुआ है. परिवार में हमें सबसे प्यार होता है. हम सबकी इज्जत करतें हैं. फिर भी कभी-कभी ऐसा होता है कि परिवार में किसी एक व्यक्ति से हमें ज्यादा प्यार होता है या कई दोस्तों में से किसी एक दोस्त से हमें ज्यादा लगाव होता है. दफ्तर में किसी ख़ास स्टाफ पर ज्यादा विश्वास होता है. ऐसा होना स्वाभाविक बात है. लेकिन किसी से ज्यादा प्यार या लगाव होना अथवा किसी ख़ास पर ही अत्यधिक विश्वास करने का मतलब यह नहीं होता है कि हम इन चीजों का दिखावा करें. उनके सामने दूसरों को कोई महत्त्व ही न दें. किसी से प्यार करने या किसी की इज्जत करने का मतलब यह नहीं होता है कि उसे खुश करने के लिए हम अपनी जिंदगी से संबंधित अहम बातों का फैसला करने का अधिकार भी उसे ही दे दें.
माना कि प्यार, इज्जत व् सहयोग आदि दोस्ती या रिश्तों के बंधन को मजबूती प्रदान करते हैं. फिर भी दोस्ती और रिश्तें में प्यार, इज्जत व् सहयोग आदि का संतुलन अगर हम बनाकर नहीं रखेंगे तो दोस्ती हो या रिश्तें हों उनमें दरार पड़ते देर नहीं लगेगी. इसलिए किसी को नाहक ही खुश करने के चक्कर में मत पड़िए. जीवन में शान्ति बनी रहेगी. वैसे लेख के अंत में एक बात जरुर कहना चाहूँगी कि अगर आप अपनी उपस्थित बुद्धिमानी के आधार पर अपने कर्म की दिशा में पूर्णत: केन्द्रित रहते हैं और किसी भी प्रकार के लोभ –लालच आदि में नही पड़ते हैं तो जीवन में इस प्रकार की स्थिति से शायद कभी न गुजरना पड़े.
तस्वीर – सप्तरंग स्टूडियो से

बहुत सुंदर ढंग से आपने सरलता के साथहमें आईना दिखाया है।अब हमारा दायित्व है कि हम इसे आत्मसात करें ःः
जवाब देंहटाएंधन्यवाद आपको, प्राचीन काल से लेकर आज तक हमारे घर -समाज में यह समस्या किसी न किसी रूप में बनी ही हुई है, जबकि डिजीटल युग आने के बाद बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक न जाने कितने ही प्रकार के कामों में तेज हो चुके हैं, किन्तु किसी को खुश करने के चक्कर में आज भी कहीं न कहीं फँस ही जाते हैं.
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