'हाँ' कहिए मगर सोच - समझकर

हमारे दैनिक जीवन में वह हर शब्द जो भी हमारे द्वारा कहा-सुना जाता है, वह कहने एवं सुनने में चाहे कितना भी छोटा हो, लेकिन होता काफी महत्वपूर्ण है. अत: हम जो कुछ भी कहें काफी सोच-समझ कर ही कहें. हमारे द्वारा कहा जाने वाला 'हाँ' या 'न' भी काफी छोटा सा शब्द होता है, लेकिन यह अपने- आप में काफी बड़े - बड़े मसले  समेटे हुए रहता है. इनके प्रयोग से हमे कहीं पर सुखानुभूति होती है, तो कहीं मन क्षुब्ध भी हो जाता है.
देखा जाता है कि अकसर लोग आपसी संकोचवश अथवा अपनी लोकप्रियता को बचाने के कारण या दूसरों पर अहसान  लादने के लिए किसी भी कार्य के लिए बिना सोचे-समझे 'हाँ' तो कर देते हैं, किन्तु किसी भी कारणवश  उसे पूरा न कर पाने अथवा ठीक से पूरा कर पाने में असफल हो जाने पर आलोचनाओं के शिकार हो जाते हैं. यही उनके तनाव ग्रस्त होने का कारण भी बन जाता है.

दूसरों की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हम दूसरों की हर उचित-अनुचित बात में  हामी भरकर अपने निश्चित कार्यक्रमों अथवा आवश्यक कामों को छोड़ अपनी सम्पूर्ण शक्ति एवं समय दूसरों के पीछे लगा दें. यदि किसी को वास्तव में सहायता या हमारी किसी वस्तु की जरुरत है, तो सम्भव प्रयास द्वारा उसे सहायता प्रदान करें, लेकिन कोई व्यक्ति स्वयं को किसी जहमत से बचाने के लिए आपको कोई काम सौंप रहा हो तो आपको इसकी पहचान होनी चाहिए, तभी आप स्पष्ट रूप से ‘न’ कह पायेंगे. हर बार तो उनसे तालमेल बिठाया नहीं जा सकता है, तो फिर ऐसी स्थिति में हमेशा तनाव, खीझ व् कुढ़न के शिकार आप ही होंगे.
    अगर आप गम्भीरता से उन व्यक्तियों की प्रकृति का अध्ययन करें, जिन्हें उदार मन से आप अपनी सेवाएँ उपलब्ध कराते रहे हैं , तो आप जरुर अनुभव करेंगे कि आपकी जरुरत के समय वो व्यक्ति कई बार कोई बहाना बनाकर आपसे मुँह मोड़ लिया है.
लेकिन मित्रों मेरी इन सब बातों का यह मतलब यह बिलकुल नहीं कि आप दूसरों को सहयोग न करें, अवश्य करें. लेकिन उन्हें अपने पर इतना हावी न होने दें कि आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही छीन जाए. किसी भी बात को ‘न’ मानने या काम के लिए ‘न’ करने का भी आपको उतना ही अधिकार है, जितना ‘हाँ’ करने का। ‘न’ करने के लिए किसी बहाने की आवश्यकता नहीं है.  हाँ, अपनी सहनशीलता की सीमा आपको अवश्य बनानी चाहिए.
किसी भी व्यक्ति से उसकी किसी भी बात के लिए ‘हाँ’ या ‘न’ करने से पूर्व उसकी बात को पूर्णरूप से सुनकर सोच-समझ लेना उचित होता है. सिर्फ उसी काम के लिए ‘हाँ’ कहे, जिसे आप पूरी जिम्मेदारी एवं क्षमता से पूरा कर सकें. यदि ऐसा सम्भव न हो तो स्पष्ट रूप से ‘न’ करने में कोई हानि नहीं है.
प्रत्येक व्याक्ति का अपने परिवार, समाज, देश एवं राष्ट्र के प्रति कुछ दायित्व होता है और इसे निभाना उसका कर्तव्य होता होता है, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति का सबसे बड़ा दायित्व उसका अपने प्रति होता है. अगर आप स्वयं के प्रति लापरवाह या उदाससीन रहेंगे तो आपका सब कुछ बिखर जाएगा.
लिहाजा आपको ‘हाँ’ की तरह ‘न’ करने की क्षमता अपने भीतर पैदा करनी चाहिए. इस क्षमता को पैदा करने के लिए आपको अपनी हर बात का दायरा स्वयं निर्धारित करना होगा.

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तस्वीर - सप्तरंग स्टूडियो

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