कसम का बदलता स्वरुप
मनीषा को आज कॉलेज से आने में फिर देर हो गयी. माँ उससे बार-बार घर देर से आने का कारण जरा रूखे स्वर में पूछ रही थी. मनीषा सोची कि आज माँ गुस्से में हैं, ऐसे मेरी बातों पर विश्वास नहीं करेगी. हाँ, अगर मैं कसम खाकर देर से घर आने का कारण बता दूँ, तो जरूर मेरी बात पर विश्वास कर लेगी. फिर तो मनीषा तुरन्त कसम खाकर देर से आने का झूठा कारण माँ को बता दी. बेटी कसम क्या खायी, माँ ने झट से बेटी की बात पर विश्वास कर लिया.
पिछले हफ्ते की ही बात है. जया जी एक खुबसूरत- सी कीमती साड़ी खरीदकर लायी तो अचानक पति महाशय साड़ी की कीमत पूछ बैठे. चूँकि साड़ी की कीमत आठ सौ रुपये थी, मगर डर के मारे जया जी पति को साड़ी की कीमत साढ़े चार सौ रुपया ही बतायीं. पति महाशय को यकीन नहीं आया कि इतने कम कीमत में इतनी खुबसूरत साड़ी कैसे मिल सकती है? पति को विश्वास दिलाने के लिए जया जी झट से भगवान का कसम खा लीं. अब पति महाशय क्या करते, वो पत्नी की बात पर विश्वास करके चुप हो गये.
मनीषा या जया जी ही कोई अकेली महिला नहीं हैं, जो झूठी कसम खाकर किसी को अपनी बात पर विश्वास करने को मजबूर करती हैं, बल्कि इनकी तरह कितने ही लोग ऐसे हैं जो झूठी कसम खा खाकर आज कसम के स्वरुप को पूरी तरह से बदलकर रख दिए हैं. किसी ज़माने में कसम उठाना व् कसम देना दृढ़ निश्चयी होने का सुबूत हुआ करता था और शायद इसलिए “प्राण जाई पर वचन न जाई” जैसी कहावत भी उस ज़माने में लोग बोला करते थे. उस ज़माने में लोग सुदृढ़ व निशिचत मानसिकता के आधार पर कसम खाते थे. लेकिन वक्त बदलने के साथ-साथ लोगों का मानसिक आधार कमजोर होता गया और लोगों में झूठी कसमें खाने की आदत पड़ती गयी. आज लोगों में ये आदत इतनी विकसित हो गयी है कि इसे आप एक लाइलाज बीमारी कह सकते हैं. इस लाइलाज बीमारी की शिकार ज्यादातर महिलाऐं ही हैं. हालांकि पुरुषों को भी कसम खाने की आदत होती है, पर उनकी संख्या कम है. जब लोग (खासकर महिलायें) कसमें खाते है तो उस वक्त ये बात बिल्कुल ही भूल जाते हैं कि वे किसकी कसम खा रहे हैं, या जिस बात के लिए वो किसी को कसम दे रहे हैं, क्या वाकई वो बात इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लिए कसम खायी जाये, इस बात का भी उन्हें अहसास ठीक से नहीं रहता है. लोग कसम खाने के चक्कर में अपने बच्चे तक की झूठी कसम खा लेते हैं. गुजरे हुए माता-पिता की कसम खाने में भी पीछे नही रहते हैं. महिलाओं के लिए तो बच्चे की या पति की कसम खाना कोई बड़ी बात नहीं रह गयी है. कसम खाने के मामले में छोटे – छोटे बच्चे भी अब पीछे नहीं रहते हैं. बस जरा आधुनिक ज़माने के हिसाब से अंग्रेजी में कसम खाते हैं. मैं आपको अपनी सहेली रूपा के बेटे का किस्सा सुनाती हूँ. बात ज्यादा दिनों की नहीं है. मैं एक दिन रूपा के साथ लॉन में बैठी हुयी थी, रूपा का सात वर्षीय बेटा रोहन खेल वहीँ पर दो चार बच्चों के साथ खेल रहा था. अचानक एक बच्चे ने खेल-खेल में उसपर बेईमान होने का इल्जाम लगा दिया (जैसा कि अक्सर बच्चे करते हैं) फिर क्या था. रोहन झट से बोला I SWEAR मैंने बेईमानी नहीं की है. बेचारी रूपा मेरे सामने शर्मिंदगी से लाल हो गयी. रूपा उठकर बेटे को तड़ से एक थप्पड़ मारी. बेटे ने थप्पड़ मारने का कारण पूछा तो रूपा बोली की तुझे कसम खाना किसने सिखलाया, तो रोहन ने कहा कि वाह ! मम्मी मैं एक बार कसम खाया तो आप मुझे मार रही हो, मगर आप तो मेरी कसम अक्सर खाती हो, पर मैं तो आपको कुछ नहीं कहता. बेचारी रूपा खीज कर रह गयी.
लेकिन देखा जाए, तो ये सिर्फ रूपा या रोहन की ही कहानी नहीं है, बल्कि नब्बे प्रतिशत घरों की कहानी है. अपनी बात की सत्यता को प्रमाणित करने का कसम एक अच्छा साधन है या यों कह लीजिए की स्वयं को ईमानदार साबित करने का एक सशक्त अस्त्र है. हिन्दी फिल्मों में हीरों-हिरोइन कभी प्रेम में एक-दूसरे की कसम खाते हैं तो कभी माँ-बहन, भाई या दोस्त के खून का बदला लेने के लिए कभी ऊँगली काट कर खून की तिलक माथे पर लगाकर कसम खाते है, तो कभी उनकी चिता या उनके चरण छुकर कसम खाता है. यानि की हिंदी फिल्मों में भी आज कसम का स्वरुप बदल चुका है. वो बात और है कि पहले की फिल्मों में भी ये कसम-वसम खाने का रिवाज था किन्तु समय के साथ फिल्मों में भी इसका स्वरूप बहुत बदल गया है. मनो-वैज्ञानिकों का कहना हैं कि जिस प्रकार झूठ बोलना एक बुरी आदत है, उसी प्रकार कसम देना या कसम खाना भी एक बुरी आदत है जो कि लगातार जारी रहने पर एक अनैच्छिक क्रिया का रूप धारण कर लेती है. यूँ तो हर उम्र व् हर वर्ग के लोग चाहे वो पुरुष हों या महिला हों, वक्त बेवक्त अपने बातों की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए कसम खाया करते हैं. फिर भी कसम खाने में महिलाएँ पुरूषों से हमेशा दो कदम आगे रहती हैं, क्योँकि आमतौर पर महिलाएँ शारीरिक रूप से कमजोर तथा अन्तर्मुखी स्वभाव की होती हैं. वैसे कसम खाने का मुख्य व् वास्तविक कारण असुरक्षा की भावना और आत्मविश्वास की कमी होना है.
खैर कसम खाने की वजह चाहे जो भी हो, पर कसम खाना एक बुरी आदत है. इसलिए हमें ऐसी आदत का शिकार नहीं होना चाहिए. बड़ों को कभी भी छोटे बच्चों के सामने बात-बात पर कसम नहीं खाना चाहिए. अगर हम स्वयं में आत्मविश्वास की भावना जगाएँ तो हमें कभी भी अपनी बातों की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए कसम का सहारा नहीं लेना पड़ेगा.
----------------------------------------------------
तस्वीर - सप्तरंग स्टूडियो से (आर्टिस्ट - रश्मि पाठक)

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें