कैरियर बनाने के प्रति आप कितने गंभीर है?

कैरियर के नाम पर एक प्रतिष्ठित पद हो। घर के नाम पर एक आलीशान मकान हो। आने-जाने के लिए गाड़ी हो। नौकर-चाकर हो। यानि की जीवन में हर प्रकार का ऐशो-आराम हो। यही सपने आजकल के हर नवयुवक-नवयुवती देखते है। किन्तु कभी तो ये सपने पुरे हो जाते है और कभी अधूरे भी रह जाते है। कुछ बनने के लिए सपने देखना बहुत जरूरी है किन्तु ये सपने एक हद तक ही देखे जाएँ तो ठीक है, नहीं तो सपनों का सामना जब हकीकत से होता है, तो पाँव तले जमीन खिसक जाती है। व्यक्ति घर का न घाट का रह जाता है। हमारे एक परिचित है जैन साहब। उनके तीन बेटे है, मगर तीनो बेटो में राकेश सबसे ज्यादा तेज था पढ़ाई में। वैसे जैन साहब तो चाहते थे की राकेश अपनी योग्यता के अनुसार किसी भी अच्छे प्रोफेशन में जाए, किन्तु राकेश की जिद्द थी की वो मेडिकल ही पढ़ेगा। बेटे की इच्छा के सामने जैन साहब कुछ भी नहीं कहते। वैसे कभी-कभार राकेश को मेडिकल के साथ साथ दूसरे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बैठने को कहते. जैन साहब के ही कहने पर राकेश ने एक बार एग्रीकल्चर का इम्तिहान दिया जिसमें उसका सिलेक्शन भी हो गया, किंतु राकेश ने एग्रीकल्चर पढ़ने से साफ इनकार कर दिया. वह दो चार साल सिर्फ मेडिकल की ही तैयारी करना चाहता था। बेटे की जिद्द के आगे जैन साहब की एक न चली. राकेश मेडिकल की शहर के बेहतरीन कोचिंग सेंटर में करने के साथ- साथ स्वध्याय के माध्यम से भी जी- जान से करता रहा। हर बार मेडिकल के इम्तहान में बैठता, मगर असफलता ही हाथ लगती। बार-बार मेडिकल के इम्तिहान में नाकाम होने की वजह से राकेश का मन धीरे-धीरे पढ़ाई से उचटने लगा। माता पिता ने लाख बार कहा कि मेडिकल का चक्कर छोड़ो और बी.ए. में एडमिशन ले लो तथा साथ ही दूसरे प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करो। मगर राकेश का तो पढ़ाई से ही मन उचट चुका था। राकेश का यह रवैया देखकर जैन साहब सोचे कि शायद शादी कर लेने से घर -गृहस्थी का बोझ पड़ेगा तो नौकरी -चाकरी के बारे में कुछ सोचेगा। यही सोचकर जैन साहब राकेश  का ब्याह कर दिए। शादी के बाद की बढ़ती हुई जिम्मेदारियों को देखते हुए राकेश ने भी हालात से समझौता कर लिया। वह किसी छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में लग गया मगर आजकल के जमाने में बिना किसी टेक्निकल क्वालीफिकेशन के या बिना अनुभव के छोटी-मोटी नौकरी भी कहाँ मिलती है ।सो राकेश को कहीं छोटी-मोटी नौकरी भी नहीं मिली।अंत में जैन साहब राकेश को अपनी दोस्त के यहाँ किराने की दुकान में काम पर लगवा दिया। इन दिनों राकेश बनिए की दुकान पर बैठकर आटे -चावल के हिसाब के साथ-साथ अपने दिशाहीन कैरियर का भी हिसाब- किताब करता रहता है। आज वह सोचता है कि अगर एग्रीकल्चर ही पढ़ लेता तो मेरे कैरियर को कोई दिशा तो मिल गई होती। मगर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। खैर राकेश को गुजारा करने के लिए कम से कम बनिए की दुकान पर तो काम मिल गया, नहीं तो कुछ लोगों को तो बनिए की दुकान पर भी काम नहीं मिल पाता है। उन्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने स्वाभिमान को छोड़कर माता- पिता या भाई के आय पर निर्भर रहना पड़ता है। मां बाप, भाई- भाभी, के तानों की बात तो दूर, इन्हें कभी-कभी छोटी -छोटी सी बात पर पत्नी या बच्चों से भी ताना सुनना पड़ जाता है। आज किसी छोटे से बच्चे से जो की अभी स्कूल में पढ़ने के लिए नहीं जाता होगा, ,उससे पूछिए कि वह बड़ा होकर क्या बनेगा, तो मासूम- सी मुस्कान के साथ बड़ी चहककर, तुतलाकर बोलेगा कि हम तो बले हो कल इंजीनियल बनेंगे या डॉक्टल बनेंगे। मासूम बच्चों की तुतलाती आवाज में इंजीनियर, डॉक्टर जैसे शब्द सुनकर मां-बाप फूले नहीं समाते। किंतु बच्चे जब बड़े होकर कैरियर बनाने के लिए कठिन संघर्ष करने लगते हैं तो मां-बाप भी हताश हो जाते हैं। आज बहुत कम लड़के- लड़कियां अपनी रूचि के अनुसार कैरियर बना पाते हैं। जिस चीज में वह कैरियर बनाना चाहते हैं उसमें लगातार असफल होते देखकर वह हालात से समझौता कर लेते हैं तथा किसी दूसरे क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए किस्मत आजमाते हैं। फिर इसमें असफल होते हैं तो किसी तीसरे चीज में कैरियर बनाने की सोचते हैं। किंतु हर लड़के -लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता बहुत से लड़के -लड़कियों को बड़ी आसानी से मनचाही नौकरी मिल जाती है या मनचाहे क्षेत्र में कैरियर बनाने का मौका मिल जाता है। यहां पर मैं उन लोगों की बात नहीं कर रही हूं जो रिश्वत या सोर्स के बल पर मनचाही नौकरी पा लेते हैं क्योंकि रिश्वत या सोर्स के बल पर कैरियर बनाना कोई बड़ी बात नहीं है। यहाँ पर मैं सिर्फ अपनी मेहनत और लगन के बल पर कैरियर बनाने वालों की बात कर रही हूँ। ऐसे बहुत से लड़के -लड़कियां है, जो मामूली- सी मेहनत करने के बाद भी इतनी अच्छी नौकरी पा लेते हैं जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती है। इसे हम भाग्य का चमत्कार कह सकते हैं। मगर हर किसी का भाग्य इतना तेज नहीं होता. यूं भी भाग्य के भरोसे बैठना बहुत बड़ी बेबकूफी है ।अगर हमें जीवन में सफलता हासिल करनी है और स्थाई कैरियर बनाना है तो सूझबूझ के साथ-साथ मेहनत और लगन से भी काम लेना होगा। सिर्फ नाम और शोहरत के पीछे भागने से कुछ भी नहीं मिलता है। माना कि इंजीनियर, डॉक्टर या आईएएस अफसर बनने के लिए रात-दिन मेहनत करनी चाहिए मगर इंजीनियर,डॉक्टर बनने के चक्कर में दूसरे क्षेत्र में जो कैरियर बनाने के अवसर हमें कदम दर कदम मिल रहे हैं उन्हें रौंद कर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। याद रखिए जो लोग आसमान देख कर चलते हैं उन्हें ही ठोकर लगती है। आज भी हमारे देश में अधिकांश लड़के ऐसे हैं जो कम आमदनी की नौकरी या मामूली होने की नौकरी को हेय दृष्टि से देखते हैं। बहुत से माता-पिता भी ऐसे हैं जो बेटे को कम आमदनी की नौकरी के लिए दूसरे शहर में नहीं भेजना चाहते हैं। हमारे पड़ोसी रमन जी के बेटे अविनाश को कंप्यूटर कोर्स करने के बाद इंदौर में प्राइवेट कंपनी में 20000/- नौकरी मिली, चूँकि अविनाश की इच्छा थी कि वह नौकरी ज्वाइन कर ले,  मगर मां-बाप के कारण उसे नौकरी से हाथ धोनी पड़ी क्योंकि उसके माता पिता का कहना था कि बीस हजार की नौकरी में कहाँ से किराए का मकान मिलेगा। कहाँ से इतनी कम कमाई में खा- पी पाएगा। इतने कम पैसे की नौकरी में कहाँ से घर बसा पाएगा. अविनाश को भी मां-बाप की बात ठीक लगी. मगर आज दो साल बाद भी अविनाश को दस हजार तक की नौकरी नहीं मिल पाई है, जिसका नतीजा यह है की वह अब चार-पाँच  हजार की नौकरी के लिए तरस रहा है। यह बात सच है कि महंगाई के इस युग में पाँच- दस हजार की नौकरी में जीवन चलाना मुश्किल है, मगर हाथ में आई हुई नौकरी को इतनी आसानी से छोड़ देना भी कोई अकल मंदी नहीं है। अगर कम आमदनी की नौकरी मिलती है तो छोड़ना नहीं चाहिए। अगर मन में लगन हो बड़ा आदमी बनने की तो आदमी छोटी -सी नौकरी करते -करते एक दिन अपनी मेहनत से प्रतिष्ठित पद की नौकरी भी पा लेता है। प्रकाश ने भी कुछ ऐसा ही किया। प्रकाश ने इंटर करने के बाद इंजीनियरिंग की खूब तैयारी की। मगर भाग्य ने साथ नहीं दिया लगातार 3 साल तक इंजीनियरिंग के लिए कड़ी मेहनत करने के पश्चात भी सफलता हाथ नहीं लगी तो वह बैंक की तैयारी करने में लग गया। बैंक की तैयारी करने के साथ-साथ उसने आर्स विषय से ग्रेजुएशन भी कर लिया। ढाई साल बाद उसे बैंक में क्लर्क की नौकरी मिल गई। नौकरी करने के साथ ही साथ वह पी. ओ की भी तैयारी करता रहा ।मेहनत रंग लाई। आज प्रकाश बैंक में क्लर्क से पी. ओ बन चुका है। आज हमारे समाज अथवा देश में बहुत से माता-पिता यही चाहते हैं कि मेरे बेटे को सरकारी नौकरी ही लगे। किंतु सरकारी नौकरी के चक्कर में उनके सुपुत्र को प्राइवेट नौकरी भी नहीं मिल पाती है। अतः आज बहुत जरूरी है कि हर लड़के- लड़कियां कैरियर बनाने के प्रति शुरू से ही संजीदा हो जाएँ। सपने देखने के साथ-साथ हकीकत से भी भली-भांति इन्हें परिचित होना चाहिए। बेरोजगारी के इस युग में हाथ आई नौकरी को छोड़ देना सही नहीं है. हाँ अगर कोई पारिवारिक कारण हो या स्वास्थ्य आदि से जुड़ी समस्या हो तो कोई बात नही. आप परिस्थिति के अनुसार ही अपने कैरियर का चुनाव करें.

जो लड़के -लड़कियां शुरू से ही कैरियर के प्रति  संजीदा होते हैं तथा कम आमदनी की नौकरी को अपनी तरक्की की पहली सीढ़ी समझते हैं, वही जीवन में कुछ हासिल कर पाते हैं। यही विचार अगर आप अपने व्यवसाय के प्रति भी रखें कि छोटे से व्यवसाय से आप कैरियर की शुरुआत करें और अपनी साकारात्मक सोच और मेहनत से बड़ा बनाने का प्रयास जारी रखें. दुनियाँ आपके बारे में क्या सोच रही है, इसमें न पड़ें. आप जिस दिन कामयाब हो जायेंगे, ये दुनियाँ याद ही नही करेगी की आप कल क्या करते थे.


तस्वीर -सप्तरंग स्टूडियो से (आर्टिस्ट - रश्मि पाठक)

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