स्लोगन लिखे वस्त्र खरीदने से पहले कुछ बातों का ध्यान जरुर रखें
कुछ दिन पहले की बात है। मेरी पड़ोसन मनोरमा जी की युवा बेटी मोना कॉलेज से एक दिन लौट रही थी, तो रास्ते में कुछ मनचले युवकों ने उसे 'बेबी डॉल' कहकर इतना चिढ़ाया की मोना नर्वस हो गयीं। घर आकर वो फुट-फुटकर रोने लगी। संजोगवश मै उस वक़्त मनोरमा जी के यहाँ ही बैठी हुई थी। जब मोना रो रोकर रोने का कारण बतायी तो मेरा ध्यान तुरन्त उसके कपड़ो पर गया। उसके स्कर्ट पर वैसे तो फूलों का प्रिंट था, पर उन फूलों के बीच- बीच में जगह जगह 'बेबी डॉल' लिखा हुआ था। शायद यही देखकर वे नवयुवक उसे 'बेबी डॉल' कहकर चिढ़ा रहे थे। देखा जाए तो आज फैशन के इस अंधे दौर में ज्यादातर कपड़े ऐसे आ रहे है, जिस पर या तो कुछ ऐसे प्रिंट होते है या ऐसा कोई स्लोगन लिखा होता है जो कई भारतीय परिवारो में सभ्यता की नज़र से अनुचित प्रतीत होता है। यूँ तो इस तरह के प्रिंट वाले या स्लोगन वाले कपड़े पहले ज्यादातर बच्चों के लिए ही बनते थे, मगर धीरे- धीरे ऐसे कपड़े युवाओं के बीच में भी लोकप्रिय होने लगे तो युवाओं पर इस तरह के कपड़ों की दीवानगी ही छा गई है। स्वयं को जरूरत से ज्यादा आधुनिक समझने वाले कुछ नवयुवक -नवयुवती इतने अटपटे स्लोगन लिखे स्टीकर भी कपड़े पर लगा लेते है, कि इन्हें कुछ समझाना ही फिजूल है। ऐसे अटपटे व अश्लील शब्दों वाले स्टीकर न सिर्फ टेलर की दुकान पर बल्कि जेनरल स्टोर में भी आसानी से मिल जाते है। जब से मॉल कल्चर ने हमारे समाज में अपनी जगह बनायी है. तब से इस प्रकार के कपड़ों की बाढ़ –सी आ गई है। मैं यहाँ पर लड़के या लड़कियों में कोई भेदभाव नही कर रही हूँ। बस अपनी बात रख रही हूँ कि लड़कों को अगर हम इस प्रकार के कपड़े पहनने के लिए नजरअंदाज कर भी दें, तो चलिए कोई बात नही (वैसे इस तरह के ओछे स्लोगन वाले कपड़े लड़कों को भी शोभा नही देते हैं, इससे उनके भी व्यक्तित्व की गरिमा खराब होती है) किन्तु युवा लड़कियों के लिए इस तरह के कपड़े पहनकर सड़क पर निकलना मनचले युवको को छेडखानी के लिए आमंत्रण देने जैसा ही है। वैसे तो आज कल के युवा लड़के - लड़कियों पर माता पिता या बड़े बुजुर्गों की अच्छी बातों का कम ही असर होता है क्योंकि इनकी नज़र में इनके माता-पिता या बड़े बुजुर्गों पुराने दकियानुसी विचारों वाले होते है। फिर भी माता-पिता तथा घर के बड़े बुजुर्गों का यह कर्तव्य बनता है की वो अपने बच्चों को इस तरह के कपड़े पहनने को मना करे। इस मामले में थोड़ी सख्ती भी बरतनी पड़े तो सख्ती करना कोई गलत बात नहीं होगी।
युवाओं को भी चाहिए की वो मन और मस्तिस्क से आधुनिक बनने का प्रयास करे। सिर्फ उल्टे सीधे डिजाइन के कपड़े पहनकर कोई आधुनिक नहीं बन सकता। ऐसी स्थिति में वो सिर्फ हँसी का पात्र बन सकता है या फूहड़ कहला सकता है। इसलिए कपड़े जब भी ख़रीदे और पहने तो इस बात का खास ध्यान रखे की आपने जो कपड़ा पहना है, वो आपको सभ्य और संस्कारी आधुनिक परिवार व समाज में रहने योग्य बना रहा है या नहीं।


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