अपनी जिम्मेदारियों को निभाना सीखो

यह लेख मैं मुख्य रूप से उस आयु वर्ग के बच्चों को केंदित करके लिखी हूँ, जो बच्चे किशोरावस्था से युवावस्था में कदम रखने वाले हैं.

बच्चों तुम्हारे दैनिक जीवन में कितने बार ऐसे हर क्षण आते हैं, जब तुम्हें अपनी जिम्मेदारियों को  निभाने का मौका मिलता है. मगर तुम अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हो. जो जिम्मेदारी तुम्हें निभानी चाहिए, उन्हें तुम दूसरों पर टाल देते हो, पर क्या यह ठीक है? तुम स्वयं अपने मन से पूछ कर देखो. तुम्हारा मन भी इसे हमेशा गलत कहेगा. मेरे एक परिचित सक्सेना जी का बेटा है नवीन. नवीन दसवीं कक्षा में पढता है किंतु बिल्कुल ही गैर जिम्मेदार है. घर में अपने किसी भी जिम्मेदारी को नहीं निभाता है, उसका कहना है कि मैं तो घर में सबसे छोटा हूं. और अगर बच्चों की घर –परिवार के लिए कोई जिम्मेदारी बनती भी है, तो वह पहले बड़े भैया निभाएंगे या फिर दीदी निभाएगी. मैं क्यों निभाऊँ. लेकिन यह बात एकदम गलत है. अगर तुम किसी घरेलू जिम्मेदारी को निभाने लायक हो चुके हो या किसी घरेलू जिम्मेदारी को निभाने के लिए स्वयं को समर्थ महसूस करते हो तो तुम्हें उस जिम्मेदारी को निभाने की चेष्टा अवश्य करनी चाहिए.

अनूप मेरे ही फ्लैट में रहता है. आठवीं कक्षा का विद्यार्थी है, किंतु अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझता है. अनूप की मां का कहना है कि उन्हें कभी भी अनूप को उसकी जिम्मेदारियों का एहसास नहीं कराना पड़ा. अनूप इतना समझदार लड़का है कि क्या बताऊं. स्कूल से आने के बाद वह सबसे पहले यूनिफॉर्म बदलता है तथा उसके बाद खाना- पीना खाकर मां से घर का काम पूछता है,  अगर घर का कोई काम हो तो तुरंत घर का काम निपटाता है. घर का कोई काम ना हो तो दोस्तों के साथ थोड़ी देर शाम को खेलता है, फिर रात को जब पढ़ने बैठता है तो साथ में दोनों छोटे भाइयों को भी पढ़ाई करवाता है. सुबह स्कूल जाने के लिए स्वयं तैयार होता है तो साथ में दोनों छोटे भाइयों को भी तैयार करता है. हर रविवार को अपने पिताजी के स्कूटर की सफाई करता है. यानि कि अपनी उम्र के हिसाब से अनूप घर में जो भी जिम्मेदारियाँ हो सके उन्हें निभाने की पूरी पूरी कोशिश करता है. साथ ही साथ वह अपनी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देता है. अनूप के माता-पिता को अपने बेटे पर नाज है.

निक्की की उम्र अभी 14 वर्ष है, लेकिन वो हर दिन अपनी मम्मी के साथ रात 8 बजे गर्म –गर्म रोटी बनाने में सहयोग करती है. अब ऐसा नही है कि निक्की की पढाई पर इसका कोई असर पड़ रहा है. दरअसल निक्की अपने पढाई–लिखाई का रूटीन घर पर ऐसा बनाई हुई है कि वो रात 8 बजे तक फ्री हो जाती है और रात का भोजन तैयार करने में खासकर रोटी बनाने में मम्मी की मदद करती है. पोती के हाथ की गर्म –गर्म रोटी खाकर दादा–दादी का मन तृप्त हो जाता है और उन्हें अपने हाथ की रोटी खिलाकर निक्की का मन भी खुश हो जाता है.

बच्चों अगर तुम भी भविष्य में एक जिम्मेदार व्यक्ति बनना चाहते हो तो आज से ही अपनी जिम्मेदारियों को समझने की चेष्टा करो. ध्यान से देखो की घर में किस समय किसको तुम्हारे मदद की आवश्यकता है. तुम्हें अपने दैनिक जीवन में इतनी सारी छोटी-छोटी जिम्मेदारियां नजर आएंगी की अपनी जिम्मेदारियों को निभाते- निभाते तुम कब एक जिम्मेदार व्यक्ति बन गये इसका तुम्हें पता भी नहीं चलेगा, पर एक बात हमेशा याद रखना कभी भी घर वालों को खुश करने के लिए या सिर्फ अपनी तारीफ सुनने के लिए कोई भी जिम्मेदारी मत निभाना. क्योंकि कभी-कभी कुछ बच्चे अपनी तारीफ सुनने के लिए ऐसी जिम्मेदारियों को निभाने का भार अपने ऊपर ले लेते हैं, जिस जिम्मेदारी को निभाने लायक या तो उनकी उम्र नहीं होती है या फिर बुद्धि नहीं होती. अतः किसी भी जिम्मेदारी को निभाने से पहले अवश्य सोच लो कि उस जिम्मेदारी को तुम भली-भांति निभा सकते हो या नहीं. अगर तुम किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए बुद्धि,  विवेक तथा धैर्य का सहारा लेते हो तो तुम्हें अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में अवश्य सफलता मिलेगी.

तस्वीर- सप्तरंग स्टूडियो से (आर्टिस्ट: रश्मि पाठक)

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